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Atharvaveda - Mantra 56

Atharvaveda 18/4/56

4 Sukta
89 Mantra
18/4/56
Devata- ककुम्मती अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दं हिर॑ण्यंबिभृहि॒ यत्ते॑ पि॒ताबि॑भः पु॒रा। स्व॒र्गं य॒तः पि॒तुर्हस्तं॒ निर्मृ॑ड्ढि॒दक्षि॑णम् ॥

इ॒दम् । हिर॑ण्यम् । बि॒भृ॒हि॒ । यत् । ते॒ । पि॒ता । अबि॑भ: । पु॒रा । स्व॒:ऽगम् । य॒त: । पि॒तु: । हस्त॑म् नि: । मृ॒ड्ढि॒ । दक्षि॑णम् ॥४.५६॥

Mantra without Swara
इदं हिरण्यंबिभृहि यत्ते पिताबिभः पुरा। स्वर्गं यतः पितुर्हस्तं निर्मृड्ढिदक्षिणम् ॥

इदम् । हिरण्यम् । बिभृहि । यत् । ते । पिता । अबिभ: । पुरा । स्व:ऽगम् । यत: । पितु: । हस्तम् नि: । मृड्ढि । दक्षिणम् ॥४.५६॥

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Meaning
१. (इदं हिरण्यम्) = इस ज्योति को (बिभृहि) = तू धारण करनेवाला बन, (यत्) = जिस ज्योति को (ते) = तेरे लिए पिता-ज्ञानदाता आचार्य ने (पुर:) = पालन व पूरण के दृष्टिकोण से (अबिभ:) = धारण किया है। जीवन के प्रथमाश्रम में आचायों द्वारा दिये जानेवाले ज्ञान को धारण करना ही हमारा कर्तव्य है। आचार्य इस बात का पूरा ध्यान करते हैं कि वह ज्ञान जीवन के पालन व पूरण के लिए उपयोगी हो, वस्तुत: ज्ञान है ही वही। अनुपयोगी बातें 'ज्ञान' कहलाने के योग्य ही नहीं। २. ज्ञान प्राप्त करने के बाद, अब एक युवक गृहस्थ में आता है। उसके लिए कहते हैं कि तू (स्वर्ग यत:) = प्रकाशमय लोक, अर्थात् वानप्रस्थ में जाते हुए (पितुः) = पिता के (दक्षिणं हस्तं निर्मृड्ढि) = दाहिने हाथ को शुद्ध करनेवाला बन । उनके उत्तरदायित्वों को अपने हाथ में लेकर उन्हें अवशिष्ट गृहकृत्यों से मुक्त करनेवाला बन । वे गृहकृत्यों से निश्चिन्त होकर नित्य स्वाध्याययुक्त होते हुए अपने लोक को प्रकाशमय बना पाएँ। 'पुत्रेषु भायां निक्षिप्यवन गच्छेत्' इस मनु वाक्य के अनुसार सन्तान पिता को भारमुक्त कर देते है। वे निश्चिन्त होकर वनस्थ होते हैं, जहाँ वे निरन्तर स्वाध्याय द्वारा अपने जीवन को प्रकाशमय बना पाते हैं।
Essence
हम ब्रह्मचार्याश्रम में आचार्यों से दिये जानेवाले हितरमणीय ज्ञान को प्राप्त करें। अब गृहस्थ में प्रवेश करते हुए हम अपने पिताओं के उत्तरदायित्व को अपने हाथ में लें, जिससे वे वनस्थ होकर निरन्तर स्वाध्याय में संलग्न हो सकें।
Subject
ब्रह्मचर्य के बाद गृहस्थ में