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Atharvaveda - Mantra 55

Atharvaveda 18/4/55

4 Sukta
89 Mantra
18/4/55
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
यथा॑ य॒माय॑ह॒र्म्यमव॑प॒न्पञ्च॑ मान॒वाः। ए॒वा व॑पामि ह॒र्म्यं यथा॑ मे॒ भूर॒योऽस॑त॥

यथा॑ । य॒माय॑ । ह॒र्म्यम् । अव॑पन् । पञ्च॑ । मा॒न॒वा: । ए॒व । व॒पा॒मि॒ । ह॒र्म्यम्‌ । यथा॑ । मे॒ । भूर॑य: । अस॑त ॥४.५५॥

Mantra without Swara
यथा यमायहर्म्यमवपन्पञ्च मानवाः। एवा वपामि हर्म्यं यथा मे भूरयोऽसत॥

यथा । यमाय । हर्म्यम् । अवपन् । पञ्च । मानवा: । एव । वपामि । हर्म्यम्‌ । यथा । मे । भूरय: । असत ॥४.५५॥

Meaning
१. (यथा) = जिस प्रकार (पञ्च मानवाः) = पञ्च यज्ञयुक्त मनुष्य-'ब्रह्मयज्ञ-देवयज्ञ-पितयज्ञ अतिथियज्ञ व बलिवैश्वदेवयज्ञ-पाँचों यज्ञों को करनेवाले व्यक्ति (हर्म्यम्) = इस शरीररूप गृह को यमाय उस सर्वनियन्ता प्रभु के लिए (अवपन्) = उत्पन्न करते हैं [beget], इसे प्रभु के लिए एक पवित्र निवासस्थान के रूप में बनाते हैं। (एवा) = इसी प्रकार में भी (हर्म्यम्) = इस शरीररूप गृह को (वपामि) = उस प्रभु के लिए बनाता हूँ-'मेरे शरीर में प्रभु का निवास हो' इसके लिए यत्नशील होता हूँ। २. इस शरीर को प्रभु का निवासस्थान मैं इसलिए बनाता हैं, (यथा) = जिससे (मे) = मेरे लिए (भूरयः असत) = बहुत हों, अर्थात् मेरा परिवार विशाल बने। मैं पृथिवीभर को अपना कुटुम्ब जानें। प्रभु का उपासक सभी को प्रभु का सन्तान जानकर सभी में बन्धुत्व की भावनावाला होता है।
Essence
मैं पाँचों यज्ञों को करता हुआ अपनी इस देह को प्रभु का निवासस्थान बनाऊँ। यह प्रभु का निवास मुझे विश्वबन्धुत्व की भावनावाला बनाएगा।
Subject
प्रभुस्मरण व विश्वबन्धुत्व की भावना

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