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Atharvaveda - Mantra 54

Atharvaveda 18/4/54

4 Sukta
89 Mantra
18/4/54
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ऊ॒र्जो भा॒गो यइ॒मं ज॒जानाश्मान्ना॑ना॒माधि॑पत्यं ज॒गाम॑। तम॑र्चत वि॒श्वमि॑त्रा ह॒विर्भिः॒ सनो॑ य॒मः प्र॑त॒रं जी॒वसे॑ धात् ॥

ऊ॒र्ज: । भा॒ग: । य: । इ॒मम् । ज॒जान॑ । अश्मा॑ । अन्ना॑नाम् । आधि॑ऽपत्यम् । ज॒गाम॑ । तम् । अ॒र्च॒त॒ । वि॒श्वऽमि॑त्रा: । ह॒वि:ऽभि॑: । स: । न॒:। य॒म: । प्र॒ऽत॒रम् । जी॒वसे॑ । धा॒त् ॥४.५४॥

Mantra without Swara
ऊर्जो भागो यइमं जजानाश्मान्नानामाधिपत्यं जगाम। तमर्चत विश्वमित्रा हविर्भिः सनो यमः प्रतरं जीवसे धात् ॥

ऊर्ज: । भाग: । य: । इमम् । जजान । अश्मा । अन्नानाम् । आधिऽपत्यम् । जगाम । तम् । अर्चत । विश्वऽमित्रा: । हवि:ऽभि: । स: । न:। यम: । प्रऽतरम् । जीवसे । धात् ॥४.५४॥

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Meaning
१. (ऊर्ज:) = सब बल व प्राणशक्तियों का (भाग:) = संविभाग करनेवाला-प्राप्त करानेवाला (यः) = जो (इमं जजान) = इस ब्रह्माण्ड को जन्म देता है, वह (अश्मा) = [अश् व्याप्तौ] सर्वव्यापक है। (अन्नानामाधिपत्यं जगाम) = वही सब अन्नों के आधिपत्य को प्राप्त हुआ है-वही सब अन्नों का स्वामी है। २. हे जीवो! तुम (विश्वमित्रा:) = सबके प्रति स्नेहवाले होते हुए (हविभिः) = त्यागपूर्वक अदन के द्वारा (तम् अर्चत) = उस प्रभु का पूजन करो। इसप्रकार 'सबके प्रति स्नेह व हवि द्वारा प्रभु-पूजन होने पर (स: यमः) = वे सर्वनियन्ता प्रभु (न:) = हमें (प्रतरं जीवसे धात्) = खूब ही दीर्घ जीवन के लिए धारण करें।
Essence
प्रभु ही बल व प्राणशक्ति का धारण करनेवाले हैं, सब अन्नों के स्वामी हैं। प्रभु पूजन का प्रकार यह है कि हम सबके प्रति स्नेहवाले होते हुए त्यागपूर्वक अदन करें। वे नियन्ता प्रभु हमें दीर्घजीवन प्राप्त कराएंगे।
Subject
"ऊर्ज: भागः' प्रभु