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Atharvaveda - Mantra 53

Atharvaveda 18/4/53

4 Sukta
89 Mantra
18/4/53
Devata- पुरोविराट सतः पङ्क्ति Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
प॒र्णोराजा॑पि॒धानं॑ चरू॒णामू॒र्जो बलं॒ सह॒ ओजो॑ न॒ आग॑न्। आयु॑र्जी॒वेभ्यो॒विद॑धद्दीर्घायु॒त्वाय॑ श॒तशा॑रदाय ॥

प॒र्ण: । राजा॑ । अ॒पि॒ऽधान॑म् । च॒रू॒णाम् । ऊ॒र्ज: । बल॑म् । सह॑ । ओज॑: । न॒: । आ । अ॒ग॒न् । आयु॑: । जी॒वेभ्य॑: । विऽद॑धत् । दी॒र्घा॒यु॒ऽत्वाय॑ । श॒तऽशा॑रदाय ॥४.५३॥

Mantra without Swara
पर्णोराजापिधानं चरूणामूर्जो बलं सह ओजो न आगन्। आयुर्जीवेभ्योविदधद्दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ॥

पर्ण: । राजा । अपिऽधानम् । चरूणाम् । ऊर्ज: । बलम् । सह । ओज: । न: । आ । अगन् । आयु: । जीवेभ्य: । विऽदधत् । दीर्घायुऽत्वाय । शतऽशारदाय ॥४.५३॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (पर्ण:) = वह सबका पालन करनेवाला प्रभु ही (राजा) = इस ब्रह्माण्ड का शासक है। वही (चरूणाम् अपिधानाम्) = चरणशील-क्रियाशील प्रजाओं को अपनी गोद में धारण करनेवाला है। 'कुर्वन्नेवेह कर्माणि' यही तो उसका हमारे लिए उपदेश है। इस प्रभु के द्वारा धारण किये जाने से (न:) = हमें (ऊर्ज:) = प्राणशक्तियाँ, (बलम्) = बल, (सहः) = शत्रुमर्षणसामर्थ्य तथा (ओज:) = कान्ति [ओजस्विता] (आगन्) = प्राप्त होती है। २. ये प्रभु ही (जीवेभ्य:) = हम जीवों के लिए (शतकापाय) = या वर्षों तक चलनेवाले (दीर्घायुत्वा) = दीर्घ-जीवन के लिए (आयुः पिदयात) = आयष्य का सम्पाटन करते हैं। प्रभुरमरण से-प्रभु की गोद में आसान होने से हम दीर्घजीवी बनते हैं।
Essence
प्रभु ही हमारा पालन करनेवाला प शासक है। वे हा क्रियाशील पुरुषों का धारण करते हैं। प्रभुकृपा से हमें बल व प्राणशक्ति प्राप्त होती है-परिणामतः हम दीर्घजीवन को धारण करते हैं।
Subject
'पर्णः राजा' प्रभु