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Atharvaveda - Mantra 51

Atharvaveda 18/4/51

4 Sukta
89 Mantra
18/4/51
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दं पि॒तृभ्यः॒प्र भ॑रामि ब॒र्हिर्जी॒वं दे॒वेभ्य॒ उत्त॑रं स्तृणामि। तदा रो॑ह पुरुष॒ मेध्यो॒भव॒न्प्रति॑ त्वा जानन्तु पि॒तरः॒ परे॑तम् ॥

इ॒दम् । पि॒तृऽभ्य॑: । प्र । भ॒रा॒मि॒ । ब॒र्हि:। जीवम् । दे॒वेभ्य॒: । उत्ऽत॑रम् । स्तृ॒णा॒मि॒। तत् । आ । रो॒ह॒ । पु॒रु॒ष॒ । मेध्य॑: । भव॑न् । प्रति॑ । त्वा॒ । जा॒न॒न्तु॒ । पि॒तर॑: । परा॑ऽइतम् ॥४.५१॥

Mantra without Swara
इदं पितृभ्यःप्र भरामि बर्हिर्जीवं देवेभ्य उत्तरं स्तृणामि। तदा रोह पुरुष मेध्योभवन्प्रति त्वा जानन्तु पितरः परेतम् ॥

इदम् । पितृऽभ्य: । प्र । भरामि । बर्हि:। जीवम् । देवेभ्य: । उत्ऽतरम् । स्तृणामि। तत् । आ । रोह । पुरुष । मेध्य: । भवन् । प्रति । त्वा । जानन्तु । पितर: । पराऽइतम् ॥४.५१॥

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Meaning
१. (पितृभ्यः) = माता, पिता व आचार्म' आदि पितरों से-इनसे प्रास प्रेरणाओं के द्वारा (बर्हि:) = वासनाशून्य हदय को (प्रभरामि) = प्रकर्षेण धारण करता हूँ। अपने हृदय को वासनाशून्य बनाता हूँ। ऐसा बनकर ही मैं पितरों को प्रीणित करनेवाला बनूंगा। (देवेभ्यः) = देववृत्ति के पुरुषों के सम्पर्क से (जीवं उत्तरम्) = अपने जीवन को उत्कृष्ट रूप में (स्तुणामि) = आच्छादित करता हूँ। इनका सम्पर्क मेरे जीवन को उत्कृष्ट बनाता है। २. (तत्) = अतः हे पुरुष! तू (मेध्यः भवन्) = पवित्र जीवनवाला होता हुआ (आरोह) = आरोहण करनेवाला बन-उत्कृष्ट जीवनवाला हो। (पितर:) = माता, पिता, आचार्य आदि (त्वा) = तुझे (परेतम्) = विषयवासनाओं से दूर चला गया ही (प्रतिजानन्तु) = प्रतिदिन जानें। तू प्रतिदिन ऊपर और ऊपर उठता चल।
Essence
पितरों से प्रेरणा प्राप्त कर हम अपने हृदयों को वासना से शून्य करें। देवों के सम्पर्क में जीवन को उत्कृष्ट बनाएँ। पवित्र होते हुए ऊपर और ऊपर उठे। देव हमें विषयों से दूर गया हुआ ही देखें।
Subject
पितृभ्यः-देवेभ्यः