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Atharvaveda - Mantra 5

Atharvaveda 18/4/5

4 Sukta
89 Mantra
18/4/5
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
जु॒हूर्दा॑धार॒द्यामु॑प॒भृद॒न्तरि॑क्षं ध्रु॒वा दा॑धार पृथि॒वीं प्र॑ति॒ष्ठाम्। प्रती॒मांलो॒का घृ॒तपृ॑ष्ठाः स्व॒र्गाः कामं॑कामं॒ यज॑मानाय दुह्राम् ॥

जु॒हू: । दा॒धा॒र॒ । द्याम् । उ॒प॒ऽभृत् । अ॒न्तर‍ि॑क्षम् । ध्रु॒वा । दा॒धा॒र॒ । पृ॒थि॒वीम् । प्र॒ति॒ऽस्थाम् । प्रति॑ । ई॒माम् । लो॒का: । घृ॒तऽपृ॑ष्ठा: । स्व॒:ऽगा: । काम॑म्ऽकामम् । यज॑मानाय । दु॒ह्ना॒म् ॥४.५॥

Mantra without Swara
जुहूर्दाधारद्यामुपभृदन्तरिक्षं ध्रुवा दाधार पृथिवीं प्रतिष्ठाम्। प्रतीमांलोका घृतपृष्ठाः स्वर्गाः कामंकामं यजमानाय दुह्राम् ॥

जुहू: । दाधार । द्याम् । उपऽभृत् । अन्तर‍िक्षम् । ध्रुवा । दाधार । पृथिवीम् । प्रतिऽस्थाम् । प्रति । ईमाम् । लोका: । घृतऽपृष्ठा: । स्व:ऽगा: । कामम्ऽकामम् । यजमानाय । दुह्नाम् ॥४.५॥

Meaning
१. यज्ञ के महत्त्व का काव्यमय वर्णन इस रूप में करते हैं कि (जुहूः द्याम् दाधार) = [हूयते अनया हविः सोमसाधनाभूतः पात्रविशेषः] जुहू नामक यज्ञपात्र घुलोक का धारण करता है। (उपभृत् अन्तारिक्षम्) = [उप समीपे जुह्वा: भ्रियते] जुहू के समीप रखा जानेवाल पात्र विशेष अन्तरिक्ष को धारण करता है। (ध्रुवा प्रतिष्ठां पृथिवीं दाधार) = ध्रुवा संज्ञिका सुक् चराचरात्मक जगत् की आश्रयभूत प्रथित भूमि को धारण करती है। इसप्रकार ये यज्ञपात्र त्रिलोक का धारण करते हैं, अर्थात् सम्पूर्ण संसार का आधार यज्ञ ही है। २. (इमां प्रति) = धुवा से धारित इस पृथिवी का लक्ष्य करके (लोका:) = सब लोक (घृतपृष्ठा:) = दीप्ति के आधारभूत होते हैं, (स्वर्गाः) = स्वर्ग ही होते हैं। सब लोक इन प्राणियों की आधारभूत पृथिवी को दीप्तिमय व स्वर्गतुल्य बनाते हैं। जब इस पृथिवी पर सब मनुष्य यज्ञशील बनते हैं, तब इस पृथिवी पर सूर्य शान्तिशील होकर तपता है [शं नस्तपतु सूर्यः], अन्तरिक्ष से बादल भी ठीक वर्षा करके अन्नोत्पत्ति का साधन बनते हैं [शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः]। ये (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए (कार्मकामम्) = प्रत्येक काम्य-चाहने योग्य पदार्थ का दुहाम्-दोहन करते हैं।
Essence
'यज्ञ' त्रिलोकी का धारण करता है। यज्ञों के होने पर सब अन्तरिक्ष व धुलोक इस पृथिवी को दीप्तिमय स्वर्गतुल्य बनाते हैं। यज्ञशील पुरुष के लिए सब काम्य पदार्थों को प्राप्त कराते हैं 'एष वोऽस्त्विष्टकामधुक'।
Subject
जुहूः, उपभृत, ध्रुवा

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