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Atharvaveda - Mantra 49

Atharvaveda 18/4/49

4 Sukta
89 Mantra
18/4/49
Devata- अनुष्टुब्गर्भा त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
आ प्रच्य॑वेथा॒मप॒ तन्मृ॑जेथां॒ यद्वा॑मभि॒भा अत्रो॒चुः। अ॒स्मादेत॑म॒घ्न्यौतद्वशी॑यो दा॒तुः पि॒तृष्वि॒हभो॑जनौ॒ मम॑ ॥

आ । प्र । च्य॒वे॒था॒म् । अप॑ । तत् । मृ॒जे॒था॒म् । यत् । वा॒म् । अभि॒ऽभा: । अत्र॑ । ऊ॒चु: । अ॒स्मात् । आ । इ॒त॒म् । अघ्न्यौ । तत् । वशी॑य: । दा॒तु: । पि॒तृषु॑ । इ॒हऽभो॑जनौ । मम॑ ॥४.४९॥

Mantra without Swara
आ प्रच्यवेथामप तन्मृजेथां यद्वामभिभा अत्रोचुः। अस्मादेतमघ्न्यौतद्वशीयो दातुः पितृष्विहभोजनौ मम ॥

आ । प्र । च्यवेथाम् । अप । तत् । मृजेथाम् । यत् । वाम् । अभिऽभा: । अत्र । ऊचु: । अस्मात् । आ । इतम् । अघ्न्यौ । तत् । वशीय: । दातु: । पितृषु । इहऽभोजनौ । मम ॥४.४९॥

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Meaning
१. पति-पत्नी के लिए कहते हैं कि (आप्रच्यवेथाम्) = [च्यु गतौ] सब प्रकार से आगे बढ़नेवाले बनो। (तत्) = उसी हेतु से-आगे बढ़ने के दृष्टिकोण से (अपमृजेथाम्) = सब दोषों को दूर करके जीवन को शुद्ध कर डालो। उसी कर्म को करनेवाले बनो (यत्) = जिसको कि (वाम्) = आप दोनों के लिए (अभिभा:) = [to glitter, to shine] ज्ञानदीस प्रभु (ऊचु:) = कहते हैं । २. इन ज्ञानदीस पुरुषों के द्वारा उपदिष्ट (अस्मात्) = इस मार्ग से ही (एतम्) = तुम दोनों गतिवाले बनो। (अध्यौ) = इस मार्ग से चलते हुए तुम वासनाओं से अहिंसनीय होओ। (तत् वशीयः) = यह ज्ञानदीस पुरुषों से उपदिष्ट मार्ग पर चलना ही इन्द्रियों को वश में करने का उत्कृष्ट साधन है। (पितृषु दातुः) = पितरों के विषय में आपको देनेवाले–पितरों के समीप प्राप्त करानेवाले (मम) = मेरे (इह अभोजनौ) = यहाँ पालनीय होओ। प्रभु कहते हैं कि मैं पितरों के समीप आपको प्राप्त कराता हूँ और इसप्रकार आपका पालन करता हूँ।
Essence
पति-पत्नी धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ें। दोषों को दूर करें। ज्ञानदीप्त पुरुषों से इस विषय में ज्ञान प्राप्त करें। उनसे उपदिष्ट मार्ग पर ही चलें। वासनाओं से आहननीय हों। प्रभु इन्हें पितरों के सम्पर्क में लाने के द्वारा रक्षित करें। पितरों से उत्तम प्रेरणा लेते हुए ये पवित्र जीवनवाले हों।
Subject
प्रगतिशील पवित्र जीवन