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Atharvaveda - Mantra 48

Atharvaveda 18/4/48

4 Sukta
89 Mantra
18/4/48
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
पृ॑थि॒वीं त्वा॑पृथि॒व्यामा वे॑शयामि दे॒वो नो॑ धा॒ता प्र ति॑रा॒त्यायुः॑। परा॑परैतावसु॒विद्वो॑ अ॒स्त्वधा॑ मृ॒ताः पि॒तृषु॒ सं भ॑वन्तु ॥

पृ॒थि॒वीम् । त्वा॒ । पृ॒थि॒व्याम् । आ । वे॒श॒या॒मि॒ । दे॒व: । न॒: । धा॒ता । प्र । त॒र॒ति॒ । आयु॑: । परा॑ऽपरैता । व॒सु॒ऽवित् । व: । अ॒स्तु॒ । अध॑ । मृ॒ता: । पि॒तृषु॑ । सम् । भ॒व॒न्तु॒ ॥४.४८॥

Mantra without Swara
पृथिवीं त्वापृथिव्यामा वेशयामि देवो नो धाता प्र तिरात्यायुः। परापरैतावसुविद्वो अस्त्वधा मृताः पितृषु सं भवन्तु ॥

पृथिवीम् । त्वा । पृथिव्याम् । आ । वेशयामि । देव: । न: । धाता । प्र । तरति । आयु: । पराऽपरैता । वसुऽवित् । व: । अस्तु । अध । मृता: । पितृषु । सम् । भवन्तु ॥४.४८॥

Meaning
१. (पृथिवीं त्वा) = घर की आधारभूत-अथवा घर का विस्तार करनेवाली तुझको (पृथिव्यामा) = इस पृथिवी पर (आवेशयामि) = सम्यक् गृह में प्रवेश कराता हूँ-बसाता हूँ। वह धाता-सबका धारण करनेवाला (देव:) = प्रकाशमय प्रभु (न:) = हम सबकी (आयुः प्रतिराति) = आयु को बढ़ाता है। इस घर में प्रभु हम सबको दीर्घजीवी बनाएँ। २. प्रभु कहते हैं कि (व:) = तुममें से (परापरैता) [परा परा एत] = खुब दूर-दूर जानेवाला-देश-देशान्तर को जानेवाला यह गृहपति (वसुवित्) = सब वसुओं [धनों] को प्राप्त होनेवाला (अस्तु) = हो। (अध) = अब (मृता:) = जिन्होंने अपनी वासनाओं को मार लिया है, वे (पितृषु संभवन्तु) = पितरों में होनेवाले हों-बानप्रस्थ होकर स्वयं सदा स्वाध्याय में लगे हुए दूसरों के लिए ज्ञान देनेवाले हों।
Essence
एक पति घर में पत्नी को सम्यक् बसाये। दोनों मिलकर घर को उत्तम बनाएँ और दीर्घजीवी बनें। पति धनों का अर्जन करनेवाला हो। गृहस्थ के बाद बासनाओं को जीतकर, वनस्थ बनें और पितरों की कोटि में प्रविष्ट हों।
Subject
गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ

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