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Atharvaveda - Mantra 41

Atharvaveda 18/4/41

4 Sukta
89 Mantra
18/4/41
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
समि॑न्धते॒अम॑र्त्यं हव्य॒वाहं॑ घृत॒प्रिय॑म्। स वे॑द॒ निहि॑तान्नि॒धीन्पि॒तॄन्प॑रा॒वतो॑ग॒तान् ॥

सम् । इ॒न्ध॒ते॒ । अम॑र्त्यम् । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । घृ॒त॒ऽप्रिय॑म् । स: । वे॒द॒ । निऽहि॑तान् । नि॒ऽधीन् । पि॒तॄन् । परा॒ऽवत॑: । ग॒तान् ॥४.४१॥

Mantra without Swara
समिन्धतेअमर्त्यं हव्यवाहं घृतप्रियम्। स वेद निहितान्निधीन्पितॄन्परावतोगतान् ॥

सम् । इन्धते । अमर्त्यम् । हव्यऽवाहम् । घृतऽप्रियम् । स: । वेद । निऽहितान् । निऽधीन् । पितॄन् । पराऽवत: । गतान् ॥४.४१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. आचार्यकुलों में उचित शिक्षण प्राप्त करनेवाले लोग उस प्रभु को अपने हृदयदेश में (समिन्धते) = समिद्ध करते हैं-उस प्रभु के प्रकाश को हृदय में देखनेवाले बनते हैं जो (अमर्त्यम्) = अविनाशी है, (हव्यवाहम्) = सब हव्य [प्रार्थनीय] पदार्थों को प्राप्त करानेवाले हैं तथा (घृतप्रियम्) = [घृतेन प्रीणाति] ज्ञानदीप्ति के द्वारा प्रीणित करनेवाले हैं। २. (सः) = वे प्रभु ही तो (निहितान् निधीन्) = 'अग्नि, वायु, आदित्य व अङ्गिरा' आदि ऋषियों के हृदयों में स्थापित किये गये वेदरूप ज्ञानकोशों को वेद-हमारे लिए प्राप्त कराते हैं तथा (परावतः) = विषयों से ऊपर उठकर सुदूर देशों में (गतान्) = प्राप्त (पितृन्) = पितरों को भी वे प्रभु ही हमारे लिए प्राप्त कराते हैं। प्रभुकृपा से ही हमें इन उच्च जीवनवाले पितरों का सम्पर्क प्राप्त होता है।
Essence
हम हृदयदेश में प्रभु के प्रकाश को देखने का प्रयत्न करें। प्रभु ही अग्नि आदि ऋषियों के हृदयों में वेदज्ञान को स्थापित करते हैं तथा प्रभुकृपा से ही हमें उच्च जीवनवाले पितरों का संग प्राप्त होता है।
Subject
प्रभु-समिन्धन