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Atharvaveda - Mantra 40

Atharvaveda 18/4/40

4 Sukta
89 Mantra
18/4/40
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
आपो॑ अ॒ग्निं प्रहि॑णुत पि॒तॄँरुपे॒मं य॒ज्ञं पि॒तरो॑ मे जुषन्ताम्। आसी॑ना॒मूर्ज॒मुप॒ येसच॑न्ते॒ ते नो॑ र॒यिं सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छान् ॥

आप॑: । अ॒ग्निम् । प्र । हि॒णु॒त॒ । पि॒तॄन् । उप॑ । इ॒मम् । य॒ज्ञम् । पि॒तर॑: । मे॒ । जु॒ष॒न्ता॒म् । आसी॑नाम् । उर्ज॑म् । उप॑ । ये । सच॑न्ते । ते । न॒: । र॒यिम् । सर्व॑ऽवीरम् । नि । य॒च्छा॒न् ॥४.४०॥

Mantra without Swara
आपो अग्निं प्रहिणुत पितॄँरुपेमं यज्ञं पितरो मे जुषन्ताम्। आसीनामूर्जमुप येसचन्ते ते नो रयिं सर्ववीरं नि यच्छान् ॥

आप: । अग्निम् । प्र । हिणुत । पितॄन् । उप । इमम् । यज्ञम् । पितर: । मे । जुषन्ताम् । आसीनाम् । उर्जम् । उप । ये । सचन्ते । ते । न: । रयिम् । सर्वऽवीरम् । नि । यच्छान् ॥४.४०॥

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Meaning
१. हे (आपः) = प्रजाओ! [गृहस्थियो!] आप (अग्निम्) = अपने इस प्रगतिशील सन्तान को (पितृन् उप) = पितरों के समीप-वनस्थ पितरों के कुलों में (प्रहिणत) = भेजो। उनके समीप इनका समुचित शिक्षण हो पाएगा। (मे) = मेरे (इमं यज्ञम्) = इस यज्ञ को (पितरः जुषन्ताम्) = पितर प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाले हों, पितरों के अनुग्रह से मेरा जीवन-यज्ञ ठीक प्रकार से चलता जाए। मैं समय समय पर उनसे उचित प्रेरणा प्राप्त करता हुआ मार्ग पर बढ़ता चलूँ। २. (आसीनाम्) = शरीर में उपविष्ट–शरीर का स्थिर अंग बनी हुई (ऊर्जम्) = बल व प्राणशक्तियों को (ये) = जो (उपसचन्ते) = अपने में समवेत करते हैं, (ते) = वे पितर (न:) = हमारे लिए (सर्ववीरम्) = सब वीरों से युक्त (रयिम्) = ऐश्वर्य को (नियच्छान्) = प्राप्त कराएँ। पितरों के क्रियात्मक उपदेशों व प्रेरणा से हम सब वीर व ऐश्वर्यसम्पन्न बनें।
Essence
हम अपने सन्तानों को पितरों के समीप उनके कुलों में पहुँचाएँ। यहाँ उनका समुचित शिक्षण हो। हमारे जीवन-यज्ञ में भी पितरों के आने-जाने से उत्तम प्रेरणा प्राप्त होती रहे। स्थिर शक्तिवाले पितर हमारे सामने आदर्श के रूप में आते हैं: वे हमें वीरता व ऐश्वर्य प्राप्त करते है।
Subject
आचार्यकुल में भेजना