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Atharvaveda - Mantra 38

Atharvaveda 18/4/38

4 Sukta
89 Mantra
18/4/38
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒हैवैधि॑धन॒सनि॑रि॒हचि॑त्त इ॒हक्र॑तुः। इ॒हैधि॑ वी॒र्यवत्तरो वयो॒धा अप॑राहतः ॥

इ॒ह । ए॒धि । वी॒र्य॑वत्ऽतर: । व॒य॒:ऽधा: । अप॑राऽहत: ॥४.३८॥

Mantra without Swara
इहैवैधिधनसनिरिहचित्त इहक्रतुः। इहैधि वीर्यवत्तरो वयोधा अपराहतः ॥

इह । एधि । वीर्यवत्ऽतर: । वय:ऽधा: । अपराऽहत: ॥४.३८॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे मनुष्य! तू (इह एव एधि) = यहाँ ही हो-सदा परलोक का ही चिन्तन न करते हुए इस लोक को उत्तम बनाने का प्रयत्न कर । (धनसनि:) = धनों का संभजन करनेवाला बन । जीवन यात्रा इस धन के बिना सफलता से सम्पन्न नहीं हो सकती। (इह चित्त:) = तू यहाँ ही चित्तवाला हो-भूत, भविष्यत् का स्मरण न करते रहकर, वर्तमान काल में चलनेवाला बन । (इह क्रतुः) = यहाँ ही संकल्पवाला तू बन । इस लोक को उत्तम बनाने के संकल्प व पुरुषार्थवाला तु हो। २. (इह) = यहाँ (वीर्यवत्तरः एथि) = खूब ही शक्तिशाली तू हो। (वयोधा:) = उत्कृष्ट जीवन को धारण करनेवाला बन और (अपराहत:) = कभी भी काम-क्रोध आदि सेतू आहत न हो।
Essence
हम भूत व भविष्यत् में न रहकर वर्तमान में रहनेवाले बनें। वर्तमान को सुन्दर बनाने का प्रयत्न करें। शक्तिशाली हों-दीर्घजीवनवाले हों और वासनाओं से पराभूत न हों।
Subject
प्रसादमय जीवन [Living in the present]