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Atharvaveda - Mantra 37

Atharvaveda 18/4/37

4 Sukta
89 Mantra
18/4/37
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दं कसा॑म्बु॒चय॑नेन चि॒तं तत्स॑जाता॒ अव॑ पश्य॒तेत॑। मर्त्यो॒ऽयम॑मृत॒त्वमे॑ति॒ तस्मै॑गृ॒हान्कृ॑णुत याव॒त्सब॑न्धु ॥

इ॒दम् । कसा॑म्बु । चय॑नेन । चि॒तम् । तत् । स॒ऽजा॒ता॒: । अव॑ । प॒श्य॒त॒ । आ । इ॒त॒ । मर्त्य॑: । अ॒यम् । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । ए॒ति॒ । तस्मै॑ । गृ॒हान् । कृ॒णु॒त॒ । या॒व॒त्ऽसब॑न्धु ॥४.३७॥

Mantra without Swara
इदं कसाम्बुचयनेन चितं तत्सजाता अव पश्यतेत। मर्त्योऽयममृतत्वमेति तस्मैगृहान्कृणुत यावत्सबन्धु ॥

इदम् । कसाम्बु । चयनेन । चितम् । तत् । सऽजाता: । अव । पश्यत । आ । इत । मर्त्य: । अयम् । अमृतऽत्वम् । एति । तस्मै । गृहान् । कृणुत । यावत्ऽसबन्धु ॥४.३७॥

Meaning
१. इस मन्त्र में ज्ञानजल को 'कसाम्बु' कहा गया है 'कस गतिशासनयोः'। यह ज्ञानजल हमारी सब गतियों का साधक बनता है और आचार्य से अनुशासन के द्वारा हमें प्राप्त होता है। (इदं कसाम्बु) = यह ज्ञानजल (चयनेन चितम्) = आचार्य के समीप रहकर चयन के द्वारा संचित किया गया है। एक विद्यार्थी आचार्य के समीप रहकर इस ज्ञान का चयन [उपार्जन] करता है। (सजाता:) = [समानकुले जाता:] समान आचार्यकुल में विकसित ज्ञानवाले छात्रो! (तत् अवपश्यत) = उस ज्ञान को तुम सम्यक् देखो और उसके अनुसार (इत) = गतिवाले होओ। २. (अयं मर्त्यः) = यह ज्ञान का चयन करनेवाला मनुष्य (अमृतत्वम् एति) = अमृतत्व को प्राप्त करता है-जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठकर मुक्त हो जाता है। (तस्मै) = उस ज्ञानी मनुष्य के लिए (गृहान् कृणुत) = उत्तम गृहों का निर्माण करो (यावत् सबन्धु) = जब तक उसे प्रभु के साथ समान बन्धुत्व प्राप्त होता है। यह सबन्धुत्व प्राप्त होने पर तो घरों की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
Essence
हम आचार्यकुल में ज्ञानजल का चयन करें। इस ज्ञानजल के द्वारा ही मनुष्य अमृतत्व को प्रास करता है। जब तक हम प्रभु के बन्धु नहीं हो जाते, तब तक हमें इस लोक में निवास के लिए उत्तम घरों का निर्माण करना आवश्यक है।
Subject
कसाम्बु

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