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Atharvaveda - Mantra 36

Atharvaveda 18/4/36

4 Sukta
89 Mantra
18/4/36
Devata- भुरिक् त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
स॒हस्र॑धारंश॒तधा॑र॒मुत्स॒मक्षि॑तं व्य॒च्यमा॑नं सलि॒लस्य॑ पृ॒ष्ठे। ऊर्जं॒दुहा॑न॒मन॑पस्पुरन्त॒मुपा॑सते पि॒तरः॑ स्व॒धाभिः॑ ॥

स॒हस्र॑ऽधारम् । श॒तऽधा॑रम् । उत्स॑म् । अक्षि॑तम् । वि॒ऽअ॒च्यमा॑नम् । स॒लि॒लस्य॑ । पृ॒ष्ठे । ऊर्ज॑म् । दुहा॑नम् । अ॒न॒प॒ऽस्फुर॑न्तम् । उप॑ । आ॒स॒ते॒ । पि॒तर॑: । स्व॒धाभि॑: ॥४.३६॥

Mantra without Swara
सहस्रधारंशतधारमुत्समक्षितं व्यच्यमानं सलिलस्य पृष्ठे। ऊर्जंदुहानमनपस्पुरन्तमुपासते पितरः स्वधाभिः ॥

सहस्रऽधारम् । शतऽधारम् । उत्सम् । अक्षितम् । विऽअच्यमानम् । सलिलस्य । पृष्ठे । ऊर्जम् । दुहानम् । अनपऽस्फुरन्तम् । उप । आसते । पितर: । स्वधाभि: ॥४.३६॥

Meaning
१. (सहस्त्रधारम्) = हज़ारों प्रकार से हमारा धारण करनेवाले, (शतधार) = शतवर्षपर्यन्त हमारे जीवन का धारण करनेवाले (उत्सम्) = यज्ञरूप स्रोत को (पितरः) = पालनात्मक कर्मों की वृत्तिवाले लोग (स्वधाभिः) = धारण करनेवाले अन्नों के उद्देश्य से (उपासते) = उपासित करते हैं। यज्ञों से वृष्टि होकर उत्तम आद्य अन्नों की प्राप्ति होती है। २. यह यज्ञरूप स्रोत (अक्षितैः) = न क्षीण होनेवाला है। (सलिलस्य पृष्ठे व्यच्यमानम्) = अन्तरिक्ष के पृष्ठ पर विस्तृत होनेवाला है। यह सारे वायुमण्डल में हविर्द्रव्यों के सूक्ष्मकणों को फैला देनेवाला है। (ऊर्ज दुहानम्) = अन्न व रस का हमारे लिए प्रपूरण करनेवाला है। (अनपस्फुरन्तम्) = सम्यक् शोभमान है। [सम्यक् शोभमानम् सा०]
Essence
यज्ञ शतश: प्रकार से हमारा धारण करनेवाला है। पालनात्मक कर्मों में प्रवृत्त लोग आद्य अन्नों के हेतु से इस यज्ञ को अपनाते हैं।
Subject
"ऊर्क का दोग्धा' यज्ञ

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