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Atharvaveda - Mantra 35

Atharvaveda 18/4/35

4 Sukta
89 Mantra
18/4/35
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
वै॑श्वान॒रेह॒विरि॒दं जु॑होमि साह॒स्रं श॒तधा॑र॒मुत्स॑म्। स बि॑भर्ति पि॒तरं॑पिताम॒हान्प्र॑पिताम॒हान्बि॑भर्ति॒ पिन्व॑मानः ॥

वै॒श्वा॒न॒रे । ह॒वि: । इ॒दम् । जु॒हो॒मि॒ । सा॒ह॒स्रम् । श॒तऽधा॑रम् । उत्स॑म् । स: । बि॒भ॒र्ति॒ । पि॒तर॑म् । पि॒ता॒म॒हान् । प्र॒ऽपि॒ता॒म॒हान् । बि॒भ॒र्ति॒ । पिन्व॑मान: ॥४.३५॥

Mantra without Swara
वैश्वानरेहविरिदं जुहोमि साहस्रं शतधारमुत्सम्। स बिभर्ति पितरंपितामहान्प्रपितामहान्बिभर्ति पिन्वमानः ॥

वैश्वानरे । हवि: । इदम् । जुहोमि । साहस्रम् । शतऽधारम् । उत्सम् । स: । बिभर्ति । पितरम् । पितामहान् । प्रऽपितामहान् । बिभर्ति । पिन्वमान: ॥४.३५॥

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Meaning
१. मैं (वैश्वानरे) = घृत व हवि को सूक्ष्म कणों में विभक्त करके सर्वत्र फैलाने के द्वारा सबका हित करनेवाले इस अग्नि में (इदम्) = इस (हविः) = घृत व हविर्द्रव्य को (जुहोमि) = आहुत करता हूँ। यह हवि (साहस्त्रम्) = हज़ारों का हित करनेवाला (शतधारम्) = शतवर्षपर्यन्त हमारा धारण करनेवाला एक (उत्सम) = स्रोत [चश्मा] ही है। यज्ञ एक धारणात्मक तत्वों के प्रवाहवाला स्रोत है। २. (स:) = वह अग्नि (पिन्वमान:) = हविर्द्रव्यों से प्रीणित किया जाता हुआ हमारे (पितरम्) = पिताओं को भी (बिभर्ति) = धारण करता है, (पितामहान्) = पितामहों का तथा (प्रपितामहान्) = प्रपिताओं का भी बिभर्ति पोषण करता है। यह हमारे बड़ों के भी स्वास्थ्य का साधन बनता है।
Essence
मैं यज्ञाग्नि में घृत आदि हविर्द्रव्यों की आहुति देता हूँ। यज्ञाग्नि में डाली गई यह हवि हज़ारों प्रकार से शतवर्षपर्यन्त हमारा धारण करनेवाली है। ये हमारे 'पिता, पितामह व प्रपितामह' आदि को भी धारण करनेवाली होती है।
Subject
यज्ञ'शतधार साहस्त्र उत्स'