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Atharvaveda - Mantra 31

Atharvaveda 18/4/31

4 Sukta
89 Mantra
18/4/31
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ए॒तत्ते॑ दे॒वःस॑वि॒ता वासो॑ ददाति॒ भर्त॑वे। तत्त्वं॑ य॒मस्य॒ राज्ये॒ वसा॑नस्ता॒र्प्यं चर॥

ए॒तत् । ते॒ । दे॒व: । स॒वि॒ता । वास॑: । द॒दा॒ति॒ । भर्त॑वे । तत् । त्वम् । य॒मस्य॑ । राज्ये॑ । वसा॑न: । ता॒र्प्य॑म् । च॒र॒ ॥४.३१॥

Mantra without Swara
एतत्ते देवःसविता वासो ददाति भर्तवे। तत्त्वं यमस्य राज्ये वसानस्तार्प्यं चर॥

एतत् । ते । देव: । सविता । वास: । ददाति । भर्तवे । तत् । त्वम् । यमस्य । राज्ये । वसान: । तार्प्यम् । चर ॥४.३१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (सविता देव:) = वह सर्वोत्पादक, सर्वप्रेरक, प्रकाशमय [दिव] प्रभु (ते) = तेरे लिए (एतत् वास:) = इस वस्त्र को (भर्तवे) = भरण-पोषण के लिए ददाति देते हैं। वस्त्र का उद्देश्य शरीर का रक्षण है। यों ही चमक-दमक व सौन्दर्य के लिए इनका धारण नहीं करना होता। २. (तत्) = उस (तार्ण्यम्) = 'तपा' नामक तृणविशेष से बने हुए अथवा प्रीतिजनक (वसान:) = वस्त्र को धारण करता हुआ (त्वम्) = तू (यमस्य राज्ये) = उस सर्वनियन्ता प्रभु के इस संसार-राज्य में (चर) = विचरनेवाला बन।
Essence
वस्त्रों का उद्देश्य 'शरीर का धारण' ही है। इस संसार में इसी उद्देश्य से वस्त्रों को धारण करते हुए विचरें। तड़क-भड़क के लिए वस्त्रों का धारण न हो।
Subject
वस्त्रों का उद्देश्य 'शरीरभरण'