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Atharvaveda - Mantra 30

Atharvaveda 18/4/30

4 Sukta
89 Mantra
18/4/30
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
कोशं॑ दुहन्तिक॒लशं॒ चतु॑र्बिल॒मिडां॑ धे॒नुं मधु॑मतीं स्व॒स्तये॑। ऊर्जं॒ मद॑न्ती॒मदि॑तिं॒जने॒ष्वग्ने॒ मा हिं॑सीः पर॒मे व्योमन् ॥

कोश॑म् । दु॒ह॒न्ति॒ । क॒लश॑म् । चतु॑:ऽबिलम् । इडा॑म् । धे॒नुम् । मधु॑ऽमतीम् । स्व॒स्तये॑ । ऊर्ज॑म् । मद॑न्तीम् । अदि॑तिम् । जने॑षु । अग्ने॑ । मा । हिं॒सी॒: । प॒र॒मे । विऽओ॑मन् ॥४.३०॥

Mantra without Swara
कोशं दुहन्तिकलशं चतुर्बिलमिडां धेनुं मधुमतीं स्वस्तये। ऊर्जं मदन्तीमदितिंजनेष्वग्ने मा हिंसीः परमे व्योमन् ॥

कोशम् । दुहन्ति । कलशम् । चतु:ऽबिलम् । इडाम् । धेनुम् । मधुऽमतीम् । स्वस्तये । ऊर्जम् । मदन्तीम् । अदितिम् । जनेषु । अग्ने । मा । हिंसी: । परमे । विऽओमन् ॥४.३०॥

Meaning
१. वेदवाणी एक गौ है, जो हमारे लिए ज्ञानरूप दुग्ध का प्रपूरण करती है। इस (इडां धेनुम) = वेदवाणीरूप गौ को जोकि (मधुमतीम्) = हमारे जीवनों को अतिशयेन मधुर बनानेवाली है, इसे (स्वस्तये) = कल्याण के लिए (दुहन्ति) = दोहते हैं। यह वेदवाणीरूप धेनु (कोशम्) = ज्ञान का कोश है। (कलशम्) = [कला शेरतेऽस्मिन्] सब कलाओं का निवासस्थान है तथा (चतुर्बिलम्) = यह वेदवाणी कलश 'ऋग, यजुः, साम, अधर्व' रूप चार बिलोंवाला है। वेदरूप इन चारों स्तनों से ज्ञानदुग्ध का प्रलवण होता है। २. इस (जनेषु) = लोगों में (ऊर्जम्) = बल व प्राणशक्ति का संचार करनेवाली, (मदन्तीम) = [मादयनीम]-जीवन को आनन्दमय बनानेवाली, (अदितिम्) = [अ-दिति] शरीर के स्वास्थ्य को नष्ट न होने देनेवाली वेदवाणीरूप गौ को, हे अग्ने-प्रगतिशील जीव! (परमे व्योमन्) = उत्कृष्ट हृदयाकाश में (मा हिंसी:) = मत हिसित कर। हृदय में तू इसे स्थान दें। इससे नित्यप्रति ज्ञानदुग्ध का दोहन करनेवाला बन।
Essence
हमारे हृदयों में सदा वेदवाणी के लिए स्थान हो। हम सदा इसका स्वाध्याय करनेवाले बनें।
Subject
इडा धेनु का दोहन

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