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Atharvaveda - Mantra 29

Atharvaveda 18/4/29

4 Sukta
89 Mantra
18/4/29
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
श॒तधा॑रंवा॒युम॒र्कं स्व॒र्विदं॑ नृ॒चक्ष॑स॒स्ते अ॒भि च॑क्षते र॒यिम्। ये पृ॒णन्ति॒ प्रच॒ यच्छ॑न्ति सर्व॒दा ते दु॑ह्रते॒ दक्षि॑णां स॒प्तमा॑तरम् ॥

श॒तऽधा॑रम् । वा॒युम् । अ॒र्कम् । स्व॒:ऽविद॑म् । नृ॒ऽचक्ष॑स: । ते । अ॒भि । च॒क्ष॒ते॒ । र॒यिम् । ये । पृ॒णन्ति॑ । प्र । च॒ । यच्छ॑न्ति । स॒र्व॒दा । ते । दु॒ह्न॒ते॒ । दक्षि॑णाम् । स॒प्तऽमा॑तरम् ॥४.२९॥

Mantra without Swara
शतधारंवायुमर्कं स्वर्विदं नृचक्षसस्ते अभि चक्षते रयिम्। ये पृणन्ति प्रच यच्छन्ति सर्वदा ते दुह्रते दक्षिणां सप्तमातरम् ॥

शतऽधारम् । वायुम् । अर्कम् । स्व:ऽविदम् । नृऽचक्षस: । ते । अभि । चक्षते । रयिम् । ये । पृणन्ति । प्र । च । यच्छन्ति । सर्वदा । ते । दुह्नते । दक्षिणाम् । सप्तऽमातरम् ॥४.२९॥

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Meaning
१. (ते नृचक्षस:) = वे मनुष्यों का ध्यान करनेवाले उनका रक्षण करनेवाले [सर्वभूताहिते रताः] पुरुष उस प्रभु को ही (रयिम् अभिचक्षते) = ऐश्वर्य के रूप में देखते हैं, जो प्रभु (शतधारम्) = शतवर्षपर्यन्त हमारा धारण करनेवाले हैं। (वायुम्) = गति द्वारा सब बुराइयों का खण्डन करनेवाले हैं। (अर्कम्) = पूजनीय हैं व सूर्यसम दीप्त हैं। (स्वर्विदम्) = सुख व प्रकाश को प्राप्त करनेवाले हैं। २. (ये) = जो प्रभु के पुजारी (पृणन्ति) = [पृणाति protect] रक्षण का कार्य करते हैं, (च) = और (सर्वदा प्रयच्छन्ति) = सदा दान देनेवाले होते हैं, (ते) = वे (दक्षिणाम) = दिये हुए दान को (सप्तमातरम् दहते) = सात गुणा मपे हुए को दोहते हैं। दिया हुआ दान उन्हें ससगुणित होकर पुनः प्रास होता है।
Essence
हम भूतहित में प्रवृत्त हुए-हुए प्रभु का पूजन करनेवाले बनें-प्रभु को ही अपना ऐश्वर्य समझें। धनों का दान देनेवाले बनें। रक्षणात्मक कर्मों में इनका विनियोग करें। ये दान दिये हुए धन सप्तगुणित होकर पुन: हमें प्राप्त होते हैं।
Subject
प्रभु-पूजन व त्याग