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Atharvaveda - Mantra 28

Atharvaveda 18/4/28

4 Sukta
89 Mantra
18/4/28
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
द्र॒प्सश्च॑स्कन्द पृथि॒वीमनु॒ द्यामि॒मं च॒ योनि॒मनु॒ यश्च॒ पूर्वः॑। स॑मा॒नंयोनि॒मनु॑ सं॒चर॑न्तं द्र॒प्सं जु॑हो॒म्यनु॑ स॒प्त होत्राः॑ ॥

द्र॒प्स: । च॒स्क॒न्द॒: । पृ॒थि॒वीम् । अनु॑ । द्याम् । इ॒मम् । च॒ । योनि॑म् । अनु॑ । य॒: । च॒ । पूर्व॑: । स॒मा॒नम् । योनि॑म् । अनु॑ । स॒म्ऽचर॑न्तम् । द्र॒प्सम् । जु॒हो॒मि॒ । अनु॑ । स॒प्त । होत्रा॑: ॥४.२८॥

Mantra without Swara
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्च पूर्वः। समानंयोनिमनु संचरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः ॥

द्रप्स: । चस्कन्द: । पृथिवीम् । अनु । द्याम् । इमम् । च । योनिम् । अनु । य: । च । पूर्व: । समानम् । योनिम् । अनु । सम्ऽचरन्तम् । द्रप्सम् । जुहोमि । अनु । सप्त । होत्रा: ॥४.२८॥

Meaning
१. गतमन्त्रों में वर्णित सात्त्विक अन्न से उत्पन्न हुआ-हुआ (द्रप्स:) = रेत:कण [Drops of semen] (पृथिवीम् द्याम् अनु) = इस शरीररूप पृथिवी व मस्तिष्करूप द्युलोक को लक्ष्य करके (चस्कन्द) = शरीर में ही ऊर्ध्व [ascend] गतिवाला होता है। (च) = और (इमं योनिम्) = इस शरीररूप घर को (यः च पूर्व:) और जो सर्वप्रथम स्थान में होनेवाला मस्तिष्करूप द्युलोक है, उसको (अनु) = लक्ष्य करके यह 'द्रप्स' शरीर में व्याप्त होता है। २. (समानम्) = [सम् आन] उत्तम प्राण शक्तियुक्त (योनिम् अनु) = शरीररूप गृह का लक्ष्य करके (संचरन्तम्) = सम्यक् गति करते हुए (द्रप्सम्) = इस रेत:कण को (सप्त होत्राः अनु जुहोमि) = मैं शरीर-यज्ञ की साधक 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' इन सात [दो कान, दो नासिका छिद्र, दो आँखें, एक मुख] होतरूप इन्द्रियों का लक्ष्य करके शरीररूप यज्ञकुण्ड में आहुत करता हूँ। इस ट्रप्स ने ही इन होताओं के शरीर यज्ञ को सिद्ध कर सकने में समर्थ करना है।
Essence
शरीर में ही व्याप्त किया गया सोम [द्रप्स] शरीर को, मस्तिष्क को ब इन्द्रियों को सशक्त व दीप्त बनाता है।
Subject
सात्त्विक अन्न से उत्पन्न 'सोम' का शरीर में स्थापन

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