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Atharvaveda - Mantra 15

Atharvaveda 18/4/15

4 Sukta
89 Mantra
18/4/15
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्होता॑ध्व॒र्युष्टे॒ बृह॒स्पति॒रिन्द्रो॑ ब्र॒ह्मा द॑क्षिण॒तस्ते॑ अस्तु। हु॒तोऽयं संस्थि॑तो य॒ज्ञ ए॑ति॒ यत्र॒ पूर्व॒मय॑नं हु॒ताना॑म् ॥

अ॒ग्नि: । होता॑ । अ॒ध्व॒र्यु: । ते॒ । बृह॒स्पति॑: । इन्द्र॑: । ब्र॒ह्मा । द॒क्षि॒ण॒त: । ते॒ । अ॒स्तु॒ । हु॒त: । अ॒यम् । सम्ऽस्थि॑त: । य॒ज्ञ: । ए॒ति॒ । यत्र॑ । पूर्व॑म् । अय॑नम् । हु॒ताना॑म् ॥४.१५॥

Mantra without Swara
अग्निर्होताध्वर्युष्टे बृहस्पतिरिन्द्रो ब्रह्मा दक्षिणतस्ते अस्तु। हुतोऽयं संस्थितो यज्ञ एति यत्र पूर्वमयनं हुतानाम् ॥

अग्नि: । होता । अध्वर्यु: । ते । बृहस्पति: । इन्द्र: । ब्रह्मा । दक्षिणत: । ते । अस्तु । हुत: । अयम् । सम्ऽस्थित: । यज्ञ: । एति । यत्र । पूर्वम् । अयनम् । हुतानाम् ॥४.१५॥

Meaning
१. हे यज्ञशील पुरुष ! (अग्निः होता) = तेरे यज्ञ का होता वह अग्रणी प्रभु ही है। (बृहस्पतिः) = ब्रह्मणस्पति-ज्ञानियों का भी ज्ञानी प्रभु (ते अध्वर्यु:) = तेरे यज्ञ का संचालक है। (इन्द्र:) = परमैश्वर्यवान् सर्वशक्तिमान् प्रभु ही (ब्रह्मा) = तेरे यज्ञ के ब्रह्मा हैं। (ते दक्षिणतः अस्तु) = इन्हें तू दक्षिणभाग में स्थित कर। आदर के लिए दक्षिणभाग में बिठाना होता है। तू प्रभु का आदर व पूजन करनेवाला हो। २. इसप्रकार प्रभु के आधार में (हुतः अयम्) = आहुत हुआ-हुआ यह (यज्ञः संस्थित:) = ठीक रूप में समास हुआ-हुआ तुझे वहाँ [गमयति] प्राप्त कराता है, (यत्र) = जहाँ कि (हुतानां पूर्वम् अयनम्) = यज्ञशील पुरुषों का [हुतं अस्य अस्ति इति हुत:] मुख्य शरणस्थान है। 'ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हवि: ब्रह्मानौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना'-ब्रह्म को ही यज्ञ का कर्ता मानता हुआ पुरुष ब्रह्म को प्राप्त करता ही है।
Essence
एक यज्ञशील पुरुष अपने यज्ञ को ब्रह्म से ही 'अग्नि [होता], बृहस्पति [अध्वर्यु] ब इन्द्र [ब्रह्म]' के रूप में होता हुआ अनुभव करता है। इसप्रकार इसका यज्ञ ठीक से समाप्त होता है और यह ब्रह्म को ही प्राप्त करता है।
Subject
'ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना'

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