Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 14

Atharvaveda 18/4/14

4 Sukta
89 Mantra
18/4/14
Devata- भुरिक् त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
ई॑जा॒नश्चि॒तमारु॑क्षद॒ग्निं नाक॑स्य पृ॒ष्ठाद्दिव॑मुत्पति॒ष्यन्। तस्मै॒ प्रभा॑ति॒ नभ॑सो॒ ज्योति॑षीमान्त्स्व॒र्गः पन्थाः॑ सु॒कृते॑ देव॒यानः॑ ॥

ई॒जा॒न: । चि॒तम् । आ । अ॒रु॒क्ष॒त् । अ॒ग्निम् । नाक॑स्य । पृ॒ष्ठात् । दिव॑म् । उ॒त्ऽप॒ति॒ष्यन् । तस्मै॑ । प्र । भा॒ति॒। नभ॑स: । ज्योति॑षीऽमान् । स्व॒:ऽग: । पन्था॑ । सु॒ऽकृते॑ । दे॒व॒ऽयान॑: ॥४.१४॥

Mantra without Swara
ईजानश्चितमारुक्षदग्निं नाकस्य पृष्ठाद्दिवमुत्पतिष्यन्। तस्मै प्रभाति नभसो ज्योतिषीमान्त्स्वर्गः पन्थाः सुकृते देवयानः ॥

ईजान: । चितम् । आ । अरुक्षत् । अग्निम् । नाकस्य । पृष्ठात् । दिवम् । उत्ऽपतिष्यन् । तस्मै । प्र । भाति। नभस: । ज्योतिषीऽमान् । स्व:ऽग: । पन्था । सुऽकृते । देवऽयान: ॥४.१४॥

Meaning
१. (ईजान:) = यज्ञशील पुरुष (चितम्) = ज्ञानस्वरूप (अग्निम्) = अग्नणी प्रभु को (आरुक्षत्) = आरूढ़ होता है-प्रभु को प्राप्त करता है। यह (नाकस्य पृष्ठात्) = स्वर्गलोक के पृष्ठ से (दिवम् उत्पतिष्यन्) = प्रकाशमय प्रभु को प्राप्त करनेवाला होता है। जब तक यज्ञों में सकामता रहती है, तब तक यह स्वर्ग को प्राप्त करता है। निष्कामता आते ही ये उसे स्वर्ग से भी ऊपर उठाकर प्रभु के समीप ले-जाते हैं। २. (तस्मै) = उस यज्ञशील पुरुष के लिए (नभस:) = आकाश से वह (ज्योतिष्मान्) = प्रभाति ज्योतिर्मय प्रभु प्रकाशित होते हैं-उसे आकाश के तारों में भी प्रभु का प्रकाश दिखता है। (सुकृते) = इस पुण्यशील पुरुष के लिए (स्वर्गः पन्थाः देवयानः) = वह [स्वर्ग] प्रकाशमय मार्ग होता है जोकि देवों का मार्ग है। देव प्रकाशमय मार्ग से गति करते हैं और अन्तत: प्रभु को प्राप्त करते हैं।
Essence
हम सकाम यज्ञों से स्वर्ग को प्राप्त करके उन्हें निष्कामता से करते हुए प्रभु को प्राप्त करनेवाले हों। यही देवयान मार्ग है।
Subject
देवयान

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.