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Atharvaveda - Mantra 10

Atharvaveda 18/4/10

4 Sukta
89 Mantra
18/4/10
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
यू॒यम॑ग्नेशन्तमाभिस्त॒नूभि॑रीजा॒नम॒भि लो॒कं स्व॒र्गम्। अश्वा॑ भू॒त्वा पृ॑ष्टि॒वाहो॑वहाथ॒ यत्र॑ दे॒वैः स॑ध॒मादं॒ मद॑न्ति ॥

यू॒यम् । अ॒ग्ने॒ । शम्ऽत॑माभि: । त॒नूभि॑: । ई॒जा॒नम् । अ॒भि । लो॒कम् । स्व॒:ऽगम् । अश्वा॑: ।भू॒त्वा । पृ॒ष्टि॒ऽवाह॑: । व॒हा॒थ॒ । यत्र॑ । दे॒वै: । स॒ध॒ऽमाद॑म् । मद॑न्ति ॥४.१०॥

Mantra without Swara
यूयमग्नेशन्तमाभिस्तनूभिरीजानमभि लोकं स्वर्गम्। अश्वा भूत्वा पृष्टिवाहोवहाथ यत्र देवैः सधमादं मदन्ति ॥

यूयम् । अग्ने । शम्ऽतमाभि: । तनूभि: । ईजानम् । अभि । लोकम् । स्व:ऽगम् । अश्वा: ।भूत्वा । पृष्टिऽवाह: । वहाथ । यत्र । देवै: । सधऽमादम् । मदन्ति ॥४.१०॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे (अग्ने) = ['पूर्व, गाईपत्य, दक्षिणाग्नि' आचार्य, पिता, माता व प्रभु]-रूप अग्नियो। (यूयम्) = आप सब (शन्तमाभिः तनूभिः) = अपने अत्यन्त शान्तिकर रूपों से [ये ते अग्ने शिवे तनुवा विराट् च स्वराट्.....सम्राट् च अभिभूश्च......विभूश्च परिभूश्च......प्रभ्वी च प्रभूतिश्च 'ते मा विशताम्' तै० १.१७.३], अर्थात् 'ज्ञानदीप्ति, जितेन्द्रियता, सम्यग् दीप्ति, शत्रुपराजय, वैभव, व्यापकता, प्रभावशक्ति, उत्कृष्ट ऐश्वर्य' आदि से आप (ईजानम्) = इस यज्ञशील पुरुष को स्वर्ग (लोकम् अभिवहाथ) = स्वर्गलोक की ओर ले-चलते हो। २. हे अग्नियो! आप इस ईजानपुरुष के लिए (अश्वः भूत्वा) = अश्वों के समान होकर इसे स्वर्ग में ले-चलते हो, जोकि (प्रष्टिवाह:) = एक घोड़ा आगे और दो घोड़े जिसमें उसके पीछे जुते हैं, ऐसे रथ के वहन करनेवाले हैं। यहाँ शरीरों में भी बुद्धिरूप घोड़े के पीछे ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्व जुते हैं। आप इस ईजान को वहाँ ले-चलते हो (यत्र) = जहाँ कि ये ईजानपुरुष (देवैः) = ज्ञानियों के साथ (सधमादं मदन्ति) = साथ बैठने के स्थान में ज्ञानचर्चाओं को करते हुए आनन्दित होते हैं।
Essence
आचार्य, पिता व मातारूप अग्नियाँ यज्ञशील पुरुष को स्वर्ग में प्राप्त कराते हैं। यहाँ यज्ञशील पुरुष देवों के साथ ज्ञानचर्चाओं में आनन्द का अनुभव करते हैं।
Subject
शन्तमाभिः तनूभिः