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Atharvaveda - Mantra 66

Atharvaveda 18/3/66

4 Sukta
73 Mantra
18/3/66
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
नाके॑सुप॒र्णमुप॒ यत्पत॑न्तं॒ हृ॒दा वेन॑न्तो अ॒भ्यच॑क्षत त्वा। हिर॑ण्यपक्षं॒वरु॑णस्य दू॒तं य॒मस्य॒ योनौ॑ शकु॒नं भु॑र॒ण्युम् ॥

नाके॑ । सु॒ऽप॒र्णम् । उप॑ । यत् । पत॑न्तम् । हृ॒दा । वेन॑न्त: । अ॒भि॒ऽअच॑क्षत । त्वा॒ । हिर॑ण्यऽयक्षम् । वरु॑णस्य । दू॒तम । य॒मस्य॑ । योनौ॑ । श॒कु॒नम् । भु॒र॒ण्यम् ॥३.६६॥

Mantra without Swara
नाकेसुपर्णमुप यत्पतन्तं हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा। हिरण्यपक्षंवरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम् ॥

नाके । सुऽपर्णम् । उप । यत् । पतन्तम् । हृदा । वेनन्त: । अभिऽअचक्षत । त्वा । हिरण्यऽयक्षम् । वरुणस्य । दूतम । यमस्य । योनौ । शकुनम् । भुरण्यम् ॥३.६६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. नाके [न अकम्] आनन्दमयस्वरूप में अथवा मोक्षधाम में (उपपतन्तम्) = समीपता से प्रास होते हुए (सुपर्णम्) = उत्तमता से पालन करनेवाले त्वा आपको, हे प्रभो। (यत्) = जब (हृदा वेनन्त:) हृदय से आपकी प्राप्ति की कामना करते हुए लोग (अभ्यचक्षत) = देखते हैं, तब वे अनुभव करते हैं कि (हिरण्यपक्षम्) = [पक्ष परिग्रहे] आप ज्ञान का परिग्रह करनेवाले हैं-ज्ञानस्वरूप हैं। (वरुणस्य दूतम्) = द्वेषनिवारण के दूत हैं, निढेषता का उपदेश देते हैं। (यमस्य योनौ शकुनम्) = संयत जीवनवाले पुरुष के शरीरगृह में शक्ति का संचार करनेवाले हैं। (भुरण्युम्) = सबका भरण करनेवाले हैं।
Essence
जीव को मोक्षधाम में प्रभु की समीपता प्राप्त होती है। जब जीव हृदय से प्रभ प्राप्ति की प्रबल कामनावाला होता है तब प्रभु-दर्शन कर पाता है। वह देखता है कि प्रभ ज्ञानस्वरूप हैं, निषता का सन्देश दे रहे हैं, संयमी को शक्तिशाली बनाते हैं और सबका भरण करनेवाले हैं।
Subject
प्रभु-दर्शन