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Atharvaveda - Mantra 57

Atharvaveda 18/3/57

4 Sukta
73 Mantra
18/3/57
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒मानारी॑रविध॒वाः सु॒पत्नी॒राञ्ज॑नेन स॒र्पिषा॒ सं स्पृ॑शन्ताम्। अ॑न॒श्रवो॑अनमी॒वाः सु॒रत्ना॒ आ रो॑हन्तु॒ जन॑यो॒ योनि॒मग्रे॑ ॥

इ॒मा:। नारी॑: । अ॒वि॒ध॒वा: । सु॒ऽपत्नी॑: । आ॒ऽअञ्ज॑नेन । स॒र्पिषा॑ । सम् । स्पृ॒श॒न्ता॒म् । अ॒न॒श्रव॑: । अ॒न॒मी॒वा: । सु॒ऽरत्ना॑: । आ । रो॒ह॒न्तु॒ । जन॑य: । योनि॑म् । अग्रे॑ ॥५.५७॥

Mantra without Swara
इमानारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं स्पृशन्ताम्। अनश्रवोअनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे ॥

इमा:। नारी: । अविधवा: । सुऽपत्नी: । आऽअञ्जनेन । सर्पिषा । सम् । स्पृशन्ताम् । अनश्रव: । अनमीवा: । सुऽरत्ना: । आ । रोहन्तु । जनय: । योनिम् । अग्रे ॥५.५७॥

Meaning
१. गृह को उत्तम बनाने का सर्वाधिक उत्तरदायित्व स्त्री का है, अत: उसका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि (इमा: नारी:) = ये गृह की उन्नति का कारणभूत [नृ नये] स्त्रियाँ (अविधवा:) = अविधवा हों। दीर्घजीवी पतियों को प्राप्त करके ये सदा अपने सौभाग्य को स्थिर रखनेवाली हों। साथ ही (सपत्नी:) = [शोभन: पतिः यस्याः] उत्तम पतियोंवाली हों। जहाँ ये स्वयं पातिव्रत्य धर्म का पालन करनेवाली हों, वहाँ इनके पति भी एकपत्नीव्रत का सुन्दरता से निर्वहण करनेवाले हों। ये पत्नियाँ (आञ्जनेन) = शरीर को (सर्वत:) = अलंकृत करनेवाले (सर्पिषा) = घृत के साथ स्पृशन्ताम्-सम्यक् स्पर्शवाली हों। इनके घरों में उस गोधूत की कमी न हो जो शरीर, मन व मस्तिष्क सभी को दीत बनानेवाला है। २. (अनश्रवः) = ये अश्रुवाली न हों-इन्हें दरिद्रता व कटुता आदि के कारण कभी रोना न पड़े। (अनमीवा:) = व्यवस्थित व संयत जीवन के कारण ये सदा नीरोग हों। (सुरत्ना:) = उत्तम रमणीय पदार्थोंवाली व उत्तम आभूषणोंवाली हों। ये (जनयः) = उत्तम सन्तानों को जन्म देनेवाली गृहस्त्रियाँ (योनिम् अग्रे आरोहन्तु) = घर में सर्वमुख्य स्थान में स्थित हों। घर में इनका उचित आदर हो।
Essence
घरों में स्त्रियों का स्थान प्रमुख हो। इन्हें घर के निर्माण के लिए आवश्यक सब वस्तुएँ सुलभ हों। इनका अपना शरीर पूर्ण स्वस्थ हो।
Subject
घरों में स्त्री का सर्वप्रमुख स्थान

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