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Atharvaveda - Mantra 52

Atharvaveda 18/3/52

4 Sukta
73 Mantra
18/3/52
Devata- भुरिक् त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
उत्ते॑ स्तभ्नामिपृथि॒वीं त्वत्परी॒मं लो॒गं नि॒दध॒न्मो अ॒हं रि॑षम्। ए॒तां स्थूणां॑ पि॒तरो॑धारयन्ति ते॒ तत्र॑ य॒मः साद॑ना ते कृणोतु ॥

उत् । ते॒ । स्त॒भ्ना॒मि॒ । पृ॒थि॒वीम् । त्वत् । परि॑ । इ॒मम् । लो॒गम् । नि॒ऽदध॑त् । मो इति॑ । अ॒हम् । रि॒ष॒म् । ए॒ताम् । स्थूणा॑म् । पि॒तर॑:। धा॒र॒य॒न्ति॒ । ते॒ । तत्र॑ । य॒म: । सद॑ना । ते॒ । कृ॒णो॒तु॒ ॥३.५२॥

Mantra without Swara
उत्ते स्तभ्नामिपृथिवीं त्वत्परीमं लोगं निदधन्मो अहं रिषम्। एतां स्थूणां पितरोधारयन्ति ते तत्र यमः सादना ते कृणोतु ॥

उत् । ते । स्तभ्नामि । पृथिवीम् । त्वत् । परि । इमम् । लोगम् । निऽदधत् । मो इति । अहम् । रिषम् । एताम् । स्थूणाम् । पितर:। धारयन्ति । ते । तत्र । यम: । सदना । ते । कृणोतु ॥३.५२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.हे गृह! (ते पृथिवीम्) = तेरी भूमि को (उत् स्तभ्नामि) = ऊपर थामता है। घर के पाये [Pedestal] को कुछ ऊँचा रखता हूँ। इससे सील का खतरा न रहकर स्वास्थ्य के लिए यह घर उपयुक्त रहता है। (त्वत् परि) = तेरे चारों ओर (इमम्) = इस (लोगम्) = पार्थिव ढेर को-मुंडेर को (निदधन्) = रखता हुआ (अहम्) = मैं (मा उरिषम्) = मत ही हिंसित होऊँ। घर के चारों ओर चारदीवारी हो ताकि पशुओं आदि का अवाञ्छनीय प्रवेश न होता रहे। २. (एतां स्थूणाम्) = घर के इस स्तम्भ को ते (पितर:) = तेरे पितर (धारयन्तु) = धारण करनेवाले हों। बच्चों के पिता के चले जाने पर मामा, चाचा, ताया आदि बड़ों का यह उत्तरदायित्व हो जाता है कि वे घर के बोझ को अपने कन्धों पर लें। (तत्र) = वहाँ-उस घर में (यमः सर्वनियन्ता) = प्रभु (ते) = तेरे लिए (सादना कृणोतु) = बैठने के स्थानों को करे । तू यहाँ घर में कर्तव्यपालन करती हुई ठहरनेवाली बन। प्रभु-स्मरण तुझे शक्ति व उत्साह दे।
Essence
घर का पाया ऊँचा हो, नीरोगता के लिए यह आवश्यक है। चारदीवारी ठीक हो ताकि अवाञ्छनीय पशु आदि का प्रवेश न हो। बच्चों के पिता के चले जाने पर रिश्तेदार घर के बोझ को अपने कन्धों पर लें। घर में प्रभु-स्मरण विलुप्त न हो।
Subject
घर