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Atharvaveda - Mantra 25

Atharvaveda 18/3/25

4 Sukta
73 Mantra
18/3/25
Devata- जगती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इन्द्रो॑ माम॒रुत्वा॒न्प्राच्या॑ दि॒शः पा॑तु बाहु॒च्युता॑ पृथि॒वी द्यामि॑वो॒परि॑।लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥

इन्द्र॑: । मा॒ । म॒रुत्वा॑न् । प्राच्या॑: । दि॒श: । पा॒तु॒ । बा॒हु॒ऽच्युता॑ । पृ॒थि॒वी । द्यामऽइ॑व । उ॒परि॑ । लो॒क॒ऽकृत॑: । प॒थि॒ऽकृत॑: । य॒जा॒म॒हे॒ । ये । दे॒वाना॑म् । हु॒तऽभा॑गा: । इ॒ह । स्थ ॥३.२५॥

Mantra without Swara
इन्द्रो मामरुत्वान्प्राच्या दिशः पातु बाहुच्युता पृथिवी द्यामिवोपरि।लोककृतः पथिकृतो यजामहे ये देवानां हुतभागा इह स्थ ॥

इन्द्र: । मा । मरुत्वान् । प्राच्या: । दिश: । पातु । बाहुऽच्युता । पृथिवी । द्यामऽइव । उपरि । लोकऽकृत: । पथिऽकृत: । यजामहे । ये । देवानाम् । हुतऽभागा: । इह । स्थ ॥३.२५॥

Meaning
१. (मरुत्वान्) = प्राणोंवाला (इन्द्रः) = शत्रुओं का विद्रावक प्रभु (मा) = मुझे (प्राच्याः दिश:) = पूर्व दिशा से आनेवाली किन्हीं भी आपत्तियों से (पातु) = बचाए। प्राणसाधना करते हुए [मरुत्वान] हम जितेन्द्रिय बनकर [इन्द्रः] आगे बढ़ते चलें [प्राची], जिससे मार्ग में आनेवाले विघ्नों को हम जीत सकें। २. (बाहुच्यता) = बाहुओं से विनिर्गत-दान में दे दी गई (पृथिवी) = भूमि (इव) = जैसे (उपरि) = ऊपर (द्याम्) = द्युलोक का रक्षण करती है, पृथिवी के दान से स्वर्ग की प्रासि होती है। यह दान हमारे लिए स्वर्ग का रक्षण करता है, इसीप्रकार प्राणसाधना व जितेन्द्रियता हमारे लिए प्राची दिशा का [अग्रगति का] रक्षण करती है। ३. इस प्राणसाधना व जितेन्द्रियता के उद्देश्य से ही हम (लोककृत:) = प्रकाश करनेवाले, (पृथिकृत:) = हमारे लिए मार्ग दर्शानेवाले पितरों को (यजामहे) = अपने साथ संगत करते हैं-इन्हें आदर देते हैं। उन पितरों को (ये) = जो (इह) = यहाँ (देवानाम्) = देवों के (हुतभागा) = हुत का सेवन करनेवाले (स्थ) = हैं, अर्थात् जो यज्ञ करके सदा यज्ञशेष का सेवन करते हैं। ४. (धाता) = सबका धारण करनेवाला प्रभु (मा) = मुझे (दक्षिणायाः दिश:) = दक्षिण दिशा से आनेवाली (नित्या:) = दुर्गति से (पातु) = रक्षित करें। धारणात्मक कर्मों में प्रवृत्त होकर हम दाक्षिण्य [कुशलता] को प्राप्त करें और दुर्गति से अपना रक्षण कर पाएँ। ५. (अदिति:) = [अ-दिति] स्वास्थ्य का देवता (आदित्यैः) = सब दिव्यगुणों के आदान के साथ (मा) = मुझे (प्रतीच्या दिश:) = इस पश्चिम दिशा से (पातु) = रक्षित करें। यह प्रतीची दिशा 'प्रति अञ्च'-प्रत्याहार की दिशा है। हम प्रत्याहार के द्वारा ही स्वस्थ बनते हैं और दिव्यगुणों का आदान कर पाते हैं। ६. (सोमः) = सोम [शान्त] प्रभु (मा) = मुझे (विश्वैर्देवै:) = सब देवों के साथ (उदीच्याः दिशः पातु) = उत्तर दिशा से रक्षित करें। यह उदीची दिशा उन्नति की दिशा है। इसके रक्षण के लिए सोम या विनीत बनना आवश्यक है। विनीतता के साथ ही सब दिव्यगुणों का वास है।
Essence
हम प्राणसाधना द्वारा जितेन्द्रिय बनते हुए आगे बढ़ें। धारणात्मक कर्मों में लगे हुए हम दाक्षिण्य को प्राप्त करें। स्वाध्याय व दिव्यगुणों के आदान के लिए हम प्रत्याहार का पाठ पढ़ें-इन्द्रियों को विषयव्यावृत करें। हम विनीत बनकर दिव्यगणों को धारण करते हुए उन्नति की दिशा में आगे बढ़ें।
Subject
'इन्द्र-धाता-अदिति-सोम'

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