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Atharvaveda - Mantra 24

Atharvaveda 18/3/24

4 Sukta
73 Mantra
18/3/24
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अक॑र्म ते॒स्वप॑सो अभूम ऋ॒तम॑वस्रन्नु॒षसो॑ विभा॒तीः। विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वाबृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑ ॥

अक॑र्म । ते॒ । सु॒ऽअप॑स: । अ॒भू॒म॒ । ऋ॒तम् । अ॒व॒स्र॒न् । उ॒षस॑: । वि॒ऽभा॒ती: । विश्व॑म् । तत् । भ॒द्रम् । यत् । अव॑न्ति । दे॒वा: । बृ॒हत्। व॒दे॒म॒ । वि॒दथे॑ । सु॒ऽवीरा॑: ॥३.२४॥

Mantra without Swara
अकर्म तेस्वपसो अभूम ऋतमवस्रन्नुषसो विभातीः। विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवाबृहद्वदेम विदथे सुवीराः ॥

अकर्म । ते । सुऽअपस: । अभूम । ऋतम् । अवस्रन् । उषस: । विऽभाती: । विश्वम् । तत् । भद्रम् । यत् । अवन्ति । देवा: । बृहत्। वदेम । विदथे । सुऽवीरा: ॥३.२४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. गतमन्त्र का उपासक प्रभु से कहता है कि (ते अकर्म) = आपकी प्राप्ति के लिए जप तप आदि कर्मों को हमने किया है [मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि] और (स्वपस:) = उत्तम यज्ञादि कौवाले हम (अभूम) = हुए हैं। (विभाती: उषस:) = ये प्रकाशमान उषाएँ (ऋतम् अवस्वन) = सत्य वेदज्ञान को आच्छादित करनेवाली हुई हैं, अर्थात् इन उषाओं में हम स्वाध्याय करनेवाले बने है। २. (विश्वं तद भद्रम) = वह सब कल्याणकर ही होता है यद (देवा: अवन्ति) = जिसे माता पिता-आचार्य आदि देव हममें [Animate, promote, favour] उत्पन्न करते हैं। हम (विदथे) = ज्ञानयज्ञों में (सुवीरा:) = बड़े वीर बनते हुए (बृहद् वदेम) = खूब ही ज्ञान की बाणियों का उच्चारण करनेवाले बनें।
Essence
हम प्रातः जप करें, यज्ञ करें, स्वाध्याय को अपनाएँ। देवों से प्रेरित कर्मों को करें। परस्पर मिलने पर ज्ञानचर्चाओं को करें और वीर बनें।
Subject
स्वपसः अभूम