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Atharvaveda - Mantra 12

Atharvaveda 18/3/12

4 Sukta
73 Mantra
18/3/12
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
मि॒त्रावरु॑णा॒परि॒ माम॑धातामादि॒त्या मा॒ स्वर॑वो वर्धयन्तु। वर्चो॑ म॒ इन्द्रो॒ न्यनक्तु॒हस्त॑योर्ज॒रद॑ष्टिं मा सवि॒ता कृ॑णोतु ॥

मि॒त्रावरु॑णा । परि॑ । माम् । अ॒धा॒ता॒म् । आ॒दि॒त्या: । मा॒ । स्वर॑व: । व॒र्ध॒य॒न्तु॒ । वर्च॑: । मे॒ । इन्द्र॑: । नि । अ॒न॒क्तु॒ । हस्त॑यो: । ज॒रत्ऽअ॒ष्टिम् । मा॒ । स॒वि॒ता । कृ॒णो॒तु॒ ॥३.१२॥

Mantra without Swara
मित्रावरुणापरि मामधातामादित्या मा स्वरवो वर्धयन्तु। वर्चो म इन्द्रो न्यनक्तुहस्तयोर्जरदष्टिं मा सविता कृणोतु ॥

मित्रावरुणा । परि । माम् । अधाताम् । आदित्या: । मा । स्वरव: । वर्धयन्तु । वर्च: । मे । इन्द्र: । नि । अनक्तु । हस्तयो: । जरत्ऽअष्टिम् । मा । सविता । कृणोतु ॥३.१२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (मित्रावरुणा) = मित्र और वरुण-स्नेह व निषता की देवताएँ (माम्) = मुझे (परि अधाताम्) = सब प्रकार से धारण करें। स्नेह व निढेषता के धारण से शरीर स्वस्थ बनता है, मन पवित्र रहता है और बुद्धि तीव्र होती है। (स्वरवः) = [स्वृ शब्दे]-ज्ञान का उपदेश करनेवाले (आदित्या:) = सूर्य के समान ज्ञानदीप्त आचार्य (मा) = मुझे (वर्धयन्तु) = बढ़ाएँ। ज्ञानोपदेश द्वारा वे मेरी वृद्धि का कारण बनें । २. (इन्द्रः) = सर्वशक्तिमान् प्रभु मे (हस्तयो:) = मेरे हाथों में (वर्चः न्यनक्त्तु) = वर्चस् को-तेजस्विता को निश्चय से जोड़े। (सविता) = वह सर्वोपादक, सर्वप्रेरक प्रभु (मा) = मुझे (जरदष्टिम्) [जरती जीर्णा अष्टिः अशनं यस्य] = जीर्ण-पचे हुए भोजनवाला (कृणोतु) = करे। भोजन के ठीक पाचन से मुझे नीरोगता व दीर्घजीवन प्राप्त हो।
Essence
मैं स्नेह व निषतावाला बनकर अपना सब प्रकार से धारण कसैं । ज्ञानी आचार्यों के उपदेश से वृद्धि को प्राप्त होऊँ। सर्वशक्तिमान् प्रभु मुझे शक्ति दें। प्रेरक प्रभु मुझे उचित प्रेरणा दें और मैं युक्ताहारविहारवाला बनकर दीर्घजीवी बनें।
Subject
मित्रावरुणा, आदित्याः, इन्द्रः, सविता