Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 1

Atharvaveda 18/3/1

4 Sukta
73 Mantra
18/3/1
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒यं नारी॑पतिलो॒कं वृ॑णा॒ना नि प॑द्यत॒ उप॑ त्वा मर्त्य॒ प्रेत॑म्। धर्मं॑पुरा॒णम॑नुपा॒लय॑न्ती॒ तस्यै॑ प्र॒जां द्रवि॑णं चे॒ह धे॑हि ॥

इ॒यम् । नारी॑ । प॒ति॒ऽलो॒कम् । वृ॒णा॒ना । नि । प॒द्य॒ते॒ । उप॑ । त्वा॒ । म॒र्त्य॒ । प्रऽइ॑तम् । धर्म॑म् । पु॒रा॒णम् । अ॒नु॒ऽपा॒लय॑न्ती । तस्यै॑ । प्र॒ऽजाम् । द्रवि॑णम् । च॒ । इ॒ह । धे॒हि॒ ॥३.१॥

Mantra without Swara
इयं नारीपतिलोकं वृणाना नि पद्यत उप त्वा मर्त्य प्रेतम्। धर्मंपुराणमनुपालयन्ती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह धेहि ॥

इयम् । नारी । पतिऽलोकम् । वृणाना । नि । पद्यते । उप । त्वा । मर्त्य । प्रऽइतम् । धर्मम् । पुराणम् । अनुऽपालयन्ती । तस्यै । प्रऽजाम् । द्रविणम् । च । इह । धेहि ॥३.१॥

Meaning
१. (इयं नारी) = यह गृह को उन्नति-पथ पर ले-चलनेवाली स्त्री (पतिलोकं वृणाना) = पतिलोक का वरण करती हुई हे (मर्त्य) = मनुष्य! (त्वा उपनिपद्यते) = तेरे समीप प्राप्त होती है। (प्रेतम्) = इस संसार से चले गये हुए भी तुझको समीपता से प्राप्त होती है, अर्थात् अपने पिता के घर में, या फिर से विवाहित होकर किसी अन्य घर में नहीं चली जाती है। २. यह नारी (पुराणम्) = [पुरा अपि नवम्] सनातन (धर्म अनुपालयन्ती) = धर्म का पालन करती हुई तुझसे दूर नहीं होती। तेरे कुल को ही अपना कुल समझती है। (तस्मै) = उस नारी के लिए (प्रजां द्रविणं च) = सन्तान व धन को (इह) = यहाँ (धेहि) = धारण कर, अर्थात् यदि पत्नी पिता के घर में लौट नहीं जाती तो सन्तानों व धनों की उत्तराधिकारिणी वही है।
Essence
पति की अकस्मात् मृत्यु हो जाने पर पत्नी ही धन व सन्तान की उत्तराधिकारिणी है, यदि धर्म का पालन करती हुई वह पतिलोक का ही वरण करती है, पिता के घर नहीं लौट जाती और न ही अन्य विवाह करती है।
Subject
पत्नी का उत्तराधिकार

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.