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Atharvaveda - Mantra 51

Atharvaveda 18/2/51

4 Sukta
60 Mantra
18/2/51
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दमिद्वा उ॒नाप॑रं ज॒रस्य॒न्यदि॒तोऽप॑रम्। जा॒या पति॑मिव॒ वास॑सा॒भ्येनं भूम ऊर्णुहि॥

इ॒दम् । इत् । वै । ऊं॒ इति॑ । न । अप॑रम् । ज॒रसि॑ । अ॒न्यत् । इ॒त: । अप॑रम् । जा॒या । पति॑म्ऽइव । वास॑सा । अ॒भि । ए॒न॒म् । भू॒मे॒ । ऊ॒र्णु॒हि॒ ॥२.५१॥

Mantra without Swara
इदमिद्वा उनापरं जरस्यन्यदितोऽपरम्। जाया पतिमिव वाससाभ्येनं भूम ऊर्णुहि॥

इदम् । इत् । वै । ऊं इति । न । अपरम् । जरसि । अन्यत् । इत: । अपरम् । जाया । पतिम्ऽइव । वाससा । अभि । एनम् । भूमे । ऊर्णुहि ॥२.५१॥

Meaning
१. (इदम् इत् वा उ) = यह हृदयों में धोतित होनेवाला प्रभु ही निश्चय से है, (न अपरम्) = इसके समान और कोई नहीं 'अन्यत् सर्वमार्तम् । (जरसि) = उस प्रभु का स्तवन होने पर (अन्यत्) = और सब-कुछ (इत: अपरम्) = इससे अपर है-नीचे है। प्रभु ही सर्वमहान् हैं। 'महतो महीयान् । २. भक्त प्रार्थना करता है कि हे (भूमे) = सबके निवासस्थानभूत प्रभो! इव जाया जैसे एक पत्नी (वासा) = वस्त्र से (पतिम्) = पति को आच्छादित कर लेती है, इसीप्रकार आप (एनम्) = इस भक्त को (अभि ऊणुर्हि सर्वत:) = आच्छादित करनेवाले होवें।
Essence
प्रभु सर्वमहान् हैं। वही स्तुति के योग्य हैं। प्रभु अपने भक्त को इसप्रकार सुरक्षित कर लेते हैं जैसे पत्नी पति को।
Subject
जैसे पत्नी पति को
Information
इस दृष्टान्त में भक्त कवियों के रहस्यवाद की गन्ध स्पष्ट है।

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