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Atharvaveda - Mantra 48

Atharvaveda 18/2/48

4 Sukta
60 Mantra
18/2/48
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
उ॑द॒न्वती॒द्यौर॑व॒मा पी॒लुम॒तीति॑ मध्य॒मा। तृ॒तीया॑ ह प्र॒द्यौरिति॒ यस्यां॑ पि॒तर॒आस॑ते ॥

उ॒द॒न्ऽवती॑ । द्यौ: । अ॒व॒मा । पी॒लुऽम॑ती । इति॑ । म॒ध्य॒मा । तृतीया॑ । ह॒ । प्र॒ऽद्यौ: । इति॑ । यस्या॑म् । पि॒तर॑: । आस॑ते ॥२.४८॥

Mantra without Swara
उदन्वतीद्यौरवमा पीलुमतीति मध्यमा। तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितरआसते ॥

उदन्ऽवती । द्यौ: । अवमा । पीलुऽमती । इति । मध्यमा । तृतीया । ह । प्रऽद्यौ: । इति । यस्याम् । पितर: । आसते ॥२.४८॥

Meaning
१. प्रकृति का विज्ञान हमें विविध भोगों को प्राप्त कराता है। यहाँ मन्त्र में 'उदक' शब्द भोगों का प्रतीक है। यह (उदन्वती द्यौः) = सब भोगों को प्राप्त करानेवाला प्रकृतिविज्ञान (अवमा) = सबसे निचला है। [पालयति इति पीलः], (पीलुमती इति) = पालक तत्त्वोंवाला जो जीव-विज्ञान है, वह मध्यमा मध्यम ज्ञान है। २. इस प्रकृति व जीव के ज्ञान से (ह) = निश्चयपूर्वक (तृतीया) = तृतीय आत्मविज्ञान है। यह परमात्मज्ञान ही (प्रद्यौः इति) = प्रकृष्ट ज्ञान के रूपों में कहा जाता है। (यस्या:) = जिस 'प्रद्यौः' में-प्रकृष्ट ज्ञान में (पितरः आसते) = पितर आसीन होते हैं। इस ज्ञान को प्राप्त करके ही तो वे पितर बनते हैं। प्रभु का जाननेवाला किसी की हिंसा न करता हुआ रक्षणात्मक कार्यों में ही प्रवृत्त होता है।
Essence
प्रकृतिविज्ञान से हम आवश्यक भोगों को प्राप्त करें। जीवविज्ञान के द्वारा अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए अपना पालन कर पाएँ । प्रकृष्ट आत्मविज्ञान हमें रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त करनेवाला हो।
Subject
उदन्वती, पीलुमती, प्रद्यौः

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