Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 32

Atharvaveda 18/2/32

4 Sukta
60 Mantra
18/2/32
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
य॒मः परोऽव॑रो॒विव॑स्वा॒न्ततः॒ परं॒ नाति॑ पश्यामि॒ किं च॒न। य॒मे अ॑ध्व॒रो अधि॑ मे॒निवि॑ष्टो॒ भुवो॒ विव॑स्वान॒न्वात॑तान ॥

य॒म: । पर॑: । अव॑र: । विव॑स्वान् । तत॒: । पर॑म् । न । अति॑ । प॒श्या॒मि॒ । किम् । च॒न । य॒मे । अ॒ध्व॒र: । अधि॑ । मे॒ । न‍िऽवि॑ष्ट: । भुव॑: । विव॑स्वान् । अ॒नुऽआ॑ततान ॥२.३२॥

Mantra without Swara
यमः परोऽवरोविवस्वान्ततः परं नाति पश्यामि किं चन। यमे अध्वरो अधि मेनिविष्टो भुवो विवस्वानन्वाततान ॥

यम: । पर: । अवर: । विवस्वान् । तत: । परम् । न । अति । पश्यामि । किम् । चन । यमे । अध्वर: । अधि । मे । न‍िऽविष्ट: । भुव: । विवस्वान् । अनुऽआततान ॥२.३२॥

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
१. प्रभुस्मरण ही हमें उत्तम जीवनवाला बनाता है, अत: साधक प्रभुस्मरण करता हुआ कहता है कि-(यमः) = सर्वनियन्ता प्रभु (परः अवर:) = दूर-से-दूर है और समीप-से-समीप है। 'दूरात् सुदूरे तदिहान्तिके च'। (विवस्वान्) = वह ज्ञान की किरणोंवाला है-अपनी ज्ञानकिरणों से साधकों के हृदयान्धकार को नष्ट करता है। (ततः परम्) = उस प्रभु से उत्कृष्ट मैं (किंचन न अतिपश्यामि) = किसी भी वस्तु को नहीं देखता हूँ। वह प्रत्येक गुण की चरमसीमा है। २. यह (मे अध्वर:) = मेरा यज्ञ (यमे अधिपश्यामि) = उस नियन्ता प्रभु में ही स्थित है-प्रभु के आधार से ही इस यज्ञ की पूर्ति होती है। 'अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च । वस्तुत: प्रभु ही होता' है, हम तो बीच में निमित्तमात्र बनते हैं। ये (विवस्वान्) = सूर्यसम दीप्त प्रभु (भुवः) = सब लोकों को (अन्वाततान) = अनुकूलता से विस्तृत किये हुए हैं। इन लोकों को वे प्रभु ही विस्तृत करनेवाले हैं। उस प्रभु का प्रकाश ही लोकों में सर्वत्र फैला हुआ है।
Essence
सर्वनियन्ता प्रभु सर्वव्यापक हैं, प्रभु से महान् और कुछ भी नहीं। प्रभु ही हमारे यज्ञों के पालक हैं और प्रभु ने ही सब लोकों को आलोकित किया हुआ है।
Subject
परोवरः यमः