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Atharvaveda - Mantra 27

Atharvaveda 18/2/27

4 Sukta
60 Mantra
18/2/27
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अपे॒मं जी॒वाअ॑रुधन्गृ॒हेभ्य॒स्तं निर्व॑हत॒ परि॒ ग्रामा॑दि॒तः। मृ॒त्युर्य॒मस्या॑सीद्दू॒तःप्रचे॑ता॒ असू॑न्पि॒तृभ्यो॑ गम॒यां च॑कार ॥

अप॑ । इ॒मम् । जी॒वा: । अ॒रु॒ध॒न् । गृ॒हेभ्य॑: । तम् । नि: । व॒ह॒त॒ । परि॑ । ग्रामा॑त् । इ॒त: । मृ॒त्यु: । य॒मस्य॑ । आ॒सी॒त् । दू॒त: । प्रऽचे॑ता: । असू॑न् । पि॒तृऽभ्य॑: । ग॒म॒याम् । च॒का॒र॒ ॥२.२७॥

Mantra without Swara
अपेमं जीवाअरुधन्गृहेभ्यस्तं निर्वहत परि ग्रामादितः। मृत्युर्यमस्यासीद्दूतःप्रचेता असून्पितृभ्यो गमयां चकार ॥

अप । इमम् । जीवा: । अरुधन् । गृहेभ्य: । तम् । नि: । वहत । परि । ग्रामात् । इत: । मृत्यु: । यमस्य । आसीत् । दूत: । प्रऽचेता: । असून् । पितृऽभ्य: । गमयाम् । चकार ॥२.२७॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.(जीवा:) = जीवन धारण करनेवाले सब गृहस्थ (इमम्) = इस अपने सन्तान को (गृहेभ्यः) = घरों से (अप अरुधन्) = दूर ही निरुद्ध करते हैं। घरों से दूर आचार्यकुलों में अपने इस सन्तान को रखते हैं। (तम्) = उस सन्तान को (इतः ग्रामात्) = यहाँ ग्राम से (परि निर्वहत) = दुर बाहर आचार्यकुल में प्राप्त कराओ। माता-पिता कहें-अब तुझे 'मृत्यवे त्वा ददामीति' मृत्यु [आचार्य] के लिए सौंपते हैं। मोहवश सन्तानों को घरों में ही रक्खे रखना ठीक नहीं। २. (मृत्युः) [आचार्यों मृत्युर्वरुणः सोम ओषधयः पयः०] = यह आचार्य (यमस्य) = उस सर्वनियन्ता प्रभु का (दूतः आसीत्) = दूत है-सन्देशहर है। यह विद्यार्थी के लिए ज्ञान का सन्देश सुनाता है। (प्रचेता:) = प्रकृष्ट ज्ञानवाला है। ज्ञान ही तो इस आचार्य की वास्तविक सम्पत्ति है। यह विद्यार्थियों को खूब शक्तिसम्पन्न व ज्ञानी बनाकर इन (असून्) = [असु-प्राणशक्ति+प्रज्ञा] प्राणशक्ति व प्रज्ञा के पुञ्जभूत स्नातकों को (पितृभ्यः) = माता-पिता के लिए (गमयांचकार) = भेजता है। यही इनका समावर्तन होता है।
Essence
गृहस्थ सन्तानों को आचार्यकुलों में भेज दें। आचार्य उन्हें संयमी विद्वान् बनाकर पुनः पितरों के समीप पास करानेवाले हों।
Subject
आचार्यकल में प्रवेश तथा वहाँ से समावर्त्तन