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Atharvaveda - Mantra 22

Atharvaveda 18/2/22

4 Sukta
60 Mantra
18/2/22
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
उत्त्वा॑ वहन्तुम॒रुत॑ उदवा॒हा उ॑द॒प्रुतः॑। अ॒जेन॑ कृ॒ण्वन्तः॑ शी॒तं व॒र्षेणो॑क्षन्तु॒बालिति॑ ॥

उत् । त्वा॒ । व॒ह॒न्तु॒ । म॒रुत॑: । उ॒द॒ऽवा॒हा: । उ॒द॒ऽप्रुत॑: । अ॒जेन॑ । कृ॒ण्वन्त॑: । शी॒तम् । व॒र्षेण॑ । उ॒क्ष॒न्तु॒ । बाल् । इति॑ ॥२.२२॥

Mantra without Swara
उत्त्वा वहन्तुमरुत उदवाहा उदप्रुतः। अजेन कृण्वन्तः शीतं वर्षेणोक्षन्तुबालिति ॥

उत् । त्वा । वहन्तु । मरुत: । उदऽवाहा: । उदऽप्रुत: । अजेन । कृण्वन्त: । शीतम् । वर्षेण । उक्षन्तु । बाल् । इति ॥२.२२॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (उदमत:) = जल के साथ गति करनेवाले (उदवाहा:) = जल का वहन करनेवाले ये (मरुतः) = वृष्टि लानेवाले वायु (त्वा) = हे साधक! तुझे (उद् वहन्तु) = उत्कृष्ट स्थिति में प्राप्त कराएँ। ठीक समय पर वृष्टि होकर जीवन के लिए अन्नादि की किसी प्रकार से कमी न हो। २. (अजेन) = [अज गतिक्षेपणयोः] गति के द्वारा व वृष्टिजल के क्षेपण के द्वारा (शीतंकृण्वन्त:) = सर्दी को करते हुए ये मरुत् (वर्षेन) = वृष्टि से (उक्षन्तु) = भूमि को सिक्क करें, बाल (इति) = जिससे [बल जीवने] सब प्राणियों को जीवनधारण के लिए अन्न प्राप्त हो सके।
Essence
वृष्टि लानेवाले वायु [मरुत] ठीक से बहते हुए हमारी स्थिति को उत्कृष्ट बनाएँ। ये वृष्टि द्वारा ग्रीष्म के सन्ताप को दूर करने के साथ अन्नोत्पादन का साधन बनते हुए हमारे लिए जीवनप्रद हों।
Subject
उदवाहा मरुतः