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Atharvaveda - Mantra 9

Atharvaveda 18/1/9

4 Sukta
61 Mantra
18/1/9
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
न ति॑ष्ठन्ति॒ ननि मि॑षन्त्ये॒ते दे॒वानां॒ स्पश॑ इ॒ह ये च॑रन्ति। अ॒न्येन॒ मदा॑हनो याहि॒तूयं॒ तेन॒ वि वृ॑ह॒ रथ्ये॑व च॒क्रा ॥

न । ति॒ष्ठ॒न्ति॒ । न । नि । मि॒ष॒न्ति॒ । ए॒ते । दे॒वाना॑म् । स्पश॑: । इ॒ह । ये । चर॑न्ति । अ॒न्येन॑ । आ॒ह॒न॒: । या॒हि॒ । तूय॑म् । तेन॑ । वि । वृ॒ह॒ । रथ्या॑ऽइव । च॒क्रा ॥१.९॥

Mantra without Swara
न तिष्ठन्ति ननि मिषन्त्येते देवानां स्पश इह ये चरन्ति। अन्येन मदाहनो याहितूयं तेन वि वृह रथ्येव चक्रा ॥

न । तिष्ठन्ति । न । नि । मिषन्ति । एते । देवानाम् । स्पश: । इह । ये । चरन्ति । अन्येन । आहन: । याहि । तूयम् । तेन । वि । वृह । रथ्याऽइव । चक्रा ॥१.९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यम उत्तर देता हुआ कहता है कि 'यह समझना कि हमारा यह सम्बन्ध छिपा रहेगा' ठीक नहीं है। मनुष्यों को न भी पता लगे, तो भी सूर्य आदि देव तो हमारे इन कर्मों को देखते ही हैं। (ये एते) = जो ये (देवानां स्पश:) = देवों के गुप्तचर, मनुष्यों के आचरण को देखते हुए (इह चरन्ति) = यहाँ विचरण करते हैं, (न तिष्ठन्ति) = न तो खडे होते हैं, (न निमिषान्ति) = न पलक मारते हैं, अर्थात् ये देव अन्तर्हित हुए-हुए हमारे सब कार्यों को जान रहे हैं। २, इसलिए हे (आहन:) = गति के द्वारा सब बुराइयों का हिंसन करनेवाली मेरी बहिन! (मद् अन्येन) = मुझसे भिन्न व्यक्ति के साथ (तूयम्) = शीन (याहि) = तू इस जीवनयात्रा में गतिशील हो। (तेन) = उसी के साथ (विवृह) = तू धर्म, अर्थ व कामरूप पुरुषार्थ के लिए उद्योग कर। उसी के साथ मिलने पर तुम दोनों (रथ्या चक्रा इव) = रथ के पहियों के समान जीवन-यात्रा में आगे और आगे बढ़नेवाले होओ।
Essence
देव हमारे प्रत्येक कर्म को देख रहे हैं, अतः हम समीप सम्बन्धों को दूर रखकर, दूर ही सम्बन्ध बनाकर धर्मार्थ, कामरूप पुरुषार्थ को सिद्ध करनेवाले हों।
Subject
देवस्पश हमें देख रहे हैं