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Atharvaveda - Mantra 61

Atharvaveda 18/1/61

4 Sukta
61 Mantra
18/1/61
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒त ए॒तउ॒दारु॑हन्दि॒वस्पृ॒ष्ठान्यारु॑हन्। प्र भू॒र्जयो॒ यथा॑ प॒था द्यामङ्गि॑रसोय॒युः ॥

इ॒त: । ए॒ते । उत् । आ । अ॒रु॒ह॒न् । दि॒व: । पृ॒ष्ठानि॑ । आ । अ॒रु॒ह॒न् । प्र । भू॒:ऽजय॑: । यथा॑ । पथा॑ । द्याम् । अङ्गि॑रस: । य॒यु: ॥१.६१॥

Mantra without Swara
इत एतउदारुहन्दिवस्पृष्ठान्यारुहन्। प्र भूर्जयो यथा पथा द्यामङ्गिरसोययुः ॥

इत: । एते । उत् । आ । अरुहन् । दिव: । पृष्ठानि । आ । अरुहन् । प्र । भू:ऽजय: । यथा । पथा । द्याम् । अङ्गिरस: । ययु: ॥१.६१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (एते) = गतमन्त्र के गतिशील व रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त लोग (इत:) = इस पृथिवीपृष्ठ से (उत् आरुहन्) = ऊपर चढ़ते हैं। (दिवः पृष्ठानि आरुहन्) = ये धुलोक के पृष्ठों पर आरूढ़ होते हैं। पृथिवीपृष्ठ से अन्तरिक्ष में और अन्तरिक्ष से धुलोक के पृष्ठ पर पहुँचते हैं। २. (भूर्जयः) = [भूः-प्राण, तं जयति] प्राणों का विजय करनेवाले-प्राणसाधना द्वारा सब इन्द्रिय-दोषों को दग्ध करनेवाले, अङ्गिरस: अंग-प्रत्यंग को रसमय रखनेवाले-शरीर को जीर्ण करनेवाली वासनाओं को दग्ध करनेवाले, सरस अंगोंवाले ये व्यक्ति यथा पथा-शास्त्रानुकूल मार्ग से यथार्थ मार्ग से (यां प्रययु:) = धुलोक को-प्रकाशमयलोक को प्राप्त होते हैं।
Essence
हम प्राणसाधना द्वारा प्राणों को वश में करनेवाले व अंग-प्रत्यंग में रसवाले बनकर योग्य मार्ग से आक्रमण करते हुए ऊपर उठते चलें और धुलोक को प्राप्त हों-देवलोक को, प्रकाशमय लोक को प्राप्त हों।
Subject
द्युलोक का आरोहण