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Atharvaveda - Mantra 59

Atharvaveda 18/1/59

4 Sukta
61 Mantra
18/1/59
Devata- पुरोबृहती Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अङ्गि॑रोभिर्य॒ज्ञियै॒रा ग॑ही॒ह यम॑ वैरू॒पैरि॒ह मा॑दयस्व। विव॑स्वन्तं हुवे॒ यःपि॒ता ते॒ऽस्मिन्ब॒र्हिष्या नि॒षद्य॑ ॥

अङ्गि॑र:ऽभि: । य॒ज्ञियै॑: । आ । ग॒हि॒ । इ॒ह । यम॑ । वै॒रू॒पै: । इ॒ह । मा॒द॒य॒स्व॒ । विव॑स्वन्तम् । हु॒वे॒ । य: । पि॒ता । ते॒ । अ॒स्मिन् । ब॒र्हिषि॑ । आ । नि॒ऽसद्य॑ ॥१.५९॥

Mantra without Swara
अङ्गिरोभिर्यज्ञियैरा गहीह यम वैरूपैरिह मादयस्व। विवस्वन्तं हुवे यःपिता तेऽस्मिन्बर्हिष्या निषद्य ॥

अङ्गिर:ऽभि: । यज्ञियै: । आ । गहि । इह । यम । वैरूपै: । इह । मादयस्व । विवस्वन्तम् । हुवे । य: । पिता । ते । अस्मिन् । बर्हिषि । आ । निऽसद्य ॥१.५९॥

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1 Bhashyas
Meaning
१.हे (यम) = संयमी जीवनवाले पुरुष! तू (इह) = इस जीवन में (अङ्गिरोभि:) = सदा क्रियाशील जीवनवाले और अतएव अंग-प्रत्यंग में रसवाले, (यज्ञियैः) = यज्ञशील व संगतिकरणयोग्य (वैरूपैः) = विशिष्ट तेजस्वीरूपवाले पितरों के साथ [मान्य पुरुषों के साथ] (इह) = यहाँ इस संसार में (आगहि) = आनेवाला हो-उनके साथ तेरा उठना बैठना हो और (मादयस्व) = उन्हीं के साथ तू आनन्द का अनुभव कर। २. तू (अस्मिन्) = इस जीवन में, (बर्हिषि) = [उद् बृह-उखाड़ना] वासनाशुन्य हृदय में-जिसमें से सब वासनाओं को उखाड़ दिया गया है (आनिषद्य) = स्थित होकर (विवस्वन्तं हुवे) = ज्ञान की किरणोंवाले उस प्रभु को पुकारनेवाला हो, (यः ते पिता) = जो तेरे पिता हैं। वस्तुतः हमें यही चाहिए कि हम अपने जीवन को यज्ञमय बनाएँ-हृदय को वासनाशून्य करें। इन्हीं में स्थित होकर प्रभु की उपासना करें।
Essence
हमारा संग सदा उत्तम हो। जीवन में हम हदय को वासनाशून्य बनाकर वहाँ प्रभु का उपासन करनेवाले बने।
Subject
सत्संग व बासनाशून्य हृदय