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Atharvaveda - Mantra 56

Atharvaveda 18/1/56

4 Sukta
61 Mantra
18/1/56
Devata- अनुष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
उ॒शन्त॑स्त्वेधीमह्यु॒शन्तः॒ समि॑धीमहि। उ॒शन्नु॑श॒त आ व॑ह पि॒तॄन्ह॒विषे॒अत्त॑वे ॥

उ॒शन्त॑: । त्वा॒ । इ॒धी॒म॒हि॒ । उ॒शन्त॑: । सम् । इ॒धी॒म॒हि॒ । उ॒शन् । उ॒श॒त: । आ । व॒ह॒ । पि॒तॄन् । ह॒विषे॑ । अत्त॑वे ॥१.५६॥

Mantra without Swara
उशन्तस्त्वेधीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आ वह पितॄन्हविषेअत्तवे ॥

उशन्त: । त्वा । इधीमहि । उशन्त: । सम् । इधीमहि । उशन् । उशत: । आ । वह । पितॄन् । हविषे । अत्तवे ॥१.५६॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. हे प्रभो। (उशन्त:) = जीवन-यात्रा को सफलतापूर्वक पूर्ण करने की कामना करते हुए हम (त्वा) = आपको (इधीमहि) = अपने हृदयदेश में दीप्त करते हैं-आपकी ज्योति को देखने के लिए यत्नशील होते हैं। हे प्रभो। (उशन्) = हम पुत्रों की सफलता को चाहते हुए आप (उशतः पितृन्) = हमारे हित को चाहनेवाले सत्प्रेरणाओं द्वारा हमारा रक्षण करनेवाले पितरों को (आवाह) = हमारे घरों पर प्राप्त कराइए, जिससे वे (हविषे अत्तवे) = हमारे घरों पर हवि को [पवित्र भोजनों को] ग्रहण करने का अनुग्रह करें। २. हे प्रभो ! (द्युमन्तः) = काम-क्रोध आदि शत्रुओं को जीतने की कामनावाले हम [दिव् विजिगीषायाम्] (त्वा) = आपको (इधीमहि) = अपने हृदयदेश में दीप्त करते हैं-आपकी ज्योति को देखने के लिए यत्नशील होते हैं। (द्युमन्तः) = शत्रुविजय की कामनावाले हम समिधीमहि आपको अपने हृदयों में खूब ही दीप्त करते हैं। हे प्रभो! आप (द्युमन्तः) = स्वयं ज्योतिर्मय होते हुए (द्युमन्तः पितृन्) = ज्योतिर्मय जीवनवाले पितरों को (आवह) = हमारे घरों पर प्राप्त कराइए, जिससे वे (हविषे अत्तवे) = हमारे घरों पर हवि को [पवित्र भोजनों को] ग्रहण करें।
Essence
हम अपने हृदयों में प्रभु को देखने के लिए प्रबल कामनावाले हों और इसी उद्देश्य से काम-क्रोधरूप शत्रुओं को जीतने के लिए यत्नशील हों। प्रभु के अनुग्रह से हमें 'हमारा हित चाहनेवाले व ज्योतिर्मय जीवनवाले' पितर प्राप्त हों। हम उनका भोजनादि द्वारा सत्कार करें और उनसे उचित प्रेरणाओं व ज्ञानों को प्राप्त करने के लिए यत्नशील हों।
Subject
पितृयज्ञ [उशन्त:-धुमन्तः]