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Atharvaveda - Mantra 55

Atharvaveda 18/1/55

4 Sukta
61 Mantra
18/1/55
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
अपे॑त॒ वीत॒ विच॑ सर्प॒तातो॒ऽस्मा ए॒तं पि॒तरो॑ लो॒कम॑क्रन्।अहो॑भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्यक्तं य॒मो द॑दात्यव॒सान॑मस्मै ॥

अप॑ । इ॒त॒ । वि । इ॒त॒ । तवि । च॒ । स॒र्प॒त॒ । अत॑: । अ॒स्मै । ए॒तम् । पि॒तर॑: । लो॒कम् । अ॒क्र॒न् । अह॑:ऽभि: । अ॒त्ऽभि: । अ॒क्तुऽभि॑: । विऽअ॑क्तम् । य॒म: । द॒दा॒ति॒ । अ॒व॒ऽसान॑म् । अ॒स्मै॒ ॥१.५५॥

Mantra without Swara
अपेत वीत विच सर्पतातोऽस्मा एतं पितरो लोकमक्रन्।अहोभिरद्भिरक्तुभिर्व्यक्तं यमो ददात्यवसानमस्मै ॥

अप । इत । वि । इत । तवि । च । सर्पत । अत: । अस्मै । एतम् । पितर: । लोकम् । अक्रन् । अह:ऽभि: । अत्ऽभि: । अक्तुऽभि: । विऽअक्तम् । यम: । ददाति । अवऽसानम् । अस्मै ॥१.५५॥

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Meaning
१. इस जीवनयात्रा में अपेत-सब दुरितों से दूर होने के लिए यत्न करो। वीत [वि-इत] विशिष्ट मार्ग पर चलो, (च) = और (विसर्पत) = विशेषरूप से गतिशील बनो। (आलस्य) = को अपने समीप मत फटकने दो। इसी दृष्टिकोण से (पितर:) = रक्षक लोग (अस्म) = इसके लिए (लोकम् अक्रन) = प्रकाश प्राप्त कराते हैं। पितरों से आलोक प्राप्त करके ये अशुभ से दूर होते हुए शुभ मार्ग का ही आक्रमण करते हैं। २. इसप्रकार (अहोभि:) = [अहन्] एक-एक क्षण के सदुपयोग के द्वारा-समय को नष्ट न करने के द्वारा (अद्धिः) = [आप:-रेतः] रेत:कणों की रक्षा के द्वारा तथा (अकुभि:) = ज्ञान की रश्मियों के द्वारा (व्यक्तम्) = विशेषरूप से अलंकृत (अवसानम्) = जन्म-मरण के अन्त को (अस्मै) = इस साधक के लिए (यमः सर्वनियन्ता) = प्रभु (ददाति) = देते हैं, अर्थात् इसे जन्म मरण के चक्र से मुक्त कर देते हैं।
Essence
मोक्षप्राप्ति का साधन यही है कि हम जीवन को अलंकृत व सुशोभित बनाएँ। जीवन को अलंकृत करने के लिए [क] समय को व्यर्थ न जाने दें, [ख] रेत:कणों का रक्षण करें, [ग] प्रकाश की किरणों को प्राप्त करें। संक्षेप में बात यह है कि सदा उत्तम कर्मों में लगे रहने से वीर्यरक्षण होता है। उससे ज्ञानाग्नि समिद्ध होकर हमारा जीवन प्रकाशमय होता है। इस प्रकाश से जीवन सुशोभित होगा तभी हम मोक्ष के अधिकारी बनेंगे।
Subject
यात्रा का अवसान