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Atharvaveda - Mantra 53

Atharvaveda 18/1/53

4 Sukta
61 Mantra
18/1/53
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
त्वष्टा॑दुहि॒त्रे व॑ह॒तुं कृ॑णोति॒ तेने॒दं विश्वं॒ भुव॑नं॒ समे॑ति। य॒मस्य॑ मा॒ताप॑र्यु॒ह्यमा॑ना म॒हो जा॒या विव॑स्वतो ननाश ॥

त्वष्टा॑ । दु॒हि॒त्रे । व॒ह॒तुम् । कृ॒णो॒ति॒ । तेन॑ । इ॒दम् । विश्व॑म् । भुव॑नम् । सम् । ए॒ति॒ । य॒मस्य॑ । मा॒ता । प॒रि॒ऽउ॒ह्यमा॑ना । म॒ह: । जा॒या । विव॑स्वत: । न॒ना॒श॒ ॥१.५३॥

Mantra without Swara
त्वष्टादुहित्रे वहतुं कृणोति तेनेदं विश्वं भुवनं समेति। यमस्य मातापर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश ॥

त्वष्टा । दुहित्रे । वहतुम् । कृणोति । तेन । इदम् । विश्वम् । भुवनम् । सम् । एति । यमस्य । माता । परिऽउह्यमाना । मह: । जाया । विवस्वत: । ननाश ॥१.५३॥

Meaning
१. (त्वष्टा) = संसार के निर्माता व सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले [त्वक्षतेर्वा स्याद् गतिकर्मण:] तथा दीतिमय [विष्णोर्वा स्याद् दीतिकर्मण:] प्रभु अपनी (दुहित्रे) = वेदवाणीरूप दुहिता [मानव जीवन का प्रपूरण करनेवाली] के लिए (वहुतं कृणोति) = विवाह को रचते हैं। (तेन) = इस विवाह के हेतु से (इदं विश्वं भुवनम्) = यह सारा भुवन उपस्थित [संगत] होता है। वस्तुत: इस वेदवाणी का विवाह सब चाहनेवाले मनुष्यों के साथ होता है। जो वेदवाणी को चाहते हैं, उन्हें यह प्राप्त होती है 'काम्यो हि वेदाधिगमः । २. यह (पर्युह्यमाना) = परिणीत होती हुई वेदवाणी (यमस्य माता) = एक संयत जीवनवाले पुरुष का निर्माण करती है। वेदवाणी के साथ हम अपना सम्बन्ध स्थापित करेंगे तो यह हमारे जीवन को अवश्य उत्कृष्ट बनाएगी। यह वेदवाणी (महः) = तेजस्वी (विवस्वत:) = ज्ञान की किरणोंवाले [ज्ञानी] पुरुष की जाया-जन्म देनेवाली है। [तद्धि जायाया जायात्वं यदस्यां जायते पुनः] । इस वेदवाणी में जन्म लेकर यह द्विज बन जाता है। इसप्रकार यह (ननाश) = [नश् to reach, attain, meet with, find] उस प्रभु के साथ मिलानेवाली होती है। वेदवाणी को जीवन का अंग बनाते हुए हम प्रभु को पाते हैं।
Essence
प्रभु अपनी वेदवाणीरूप दुहिता को हमें साथी के रूप में देते हैं। यह साथी हमें 'बड़े संयत जीवनवाला, तेजस्वी व ज्ञानी' बनाता है। ऐसा बनकर हम प्रभु को पाने के अधिकारी बनते हैं।
Subject
त्वष्टा की दुहिता का परिणय

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