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Atharvaveda - Mantra 51

Atharvaveda 18/1/51

4 Sukta
61 Mantra
18/1/51
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- पितरगण Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
बर्हि॑षदः पितरऊ॒त्यर्वागि॒मा वो॑ ह॒व्या च॑कृमा जु॒षध्व॑म्। त आ ग॒ताव॑सा॒ शन्त॑मे॒नाधा॑ नः॒शं योर॑र॒पो द॑धात ॥

बर्हि॑ऽसद: । पि॒त॒र॒: । ऊ॒ती । अ॒र्वाक् । इ॒मा । व॒: । ह॒व्या । च॒कृ॒म॒ । जु॒षध्व॑म् । ते । आ । ग॒त॒ । अव॑सा । शम्ऽत॑मेन । अध॑ । न॒: । शम् । यो: । अ॒र॒प । द॒धा॒त॒ ॥१.५१॥

Mantra without Swara
बर्हिषदः पितरऊत्यर्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्। त आ गतावसा शन्तमेनाधा नःशं योररपो दधात ॥

बर्हिऽसद: । पितर: । ऊती । अर्वाक् । इमा । व: । हव्या । चकृम । जुषध्वम् । ते । आ । गत । अवसा । शम्ऽतमेन । अध । न: । शम् । यो: । अरप । दधात ॥१.५१॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. (बर्हिषदः) = यज्ञों में आसीन होनेवाले (पितर:) = रक्षक लोगो! ऊती-हमारे रक्षण के हेतु से (अर्वाक्) = आप हमें समीपता से प्राप्त होवें। (इमा हव्या) = इन हव्य पदार्थों को हम (वः चकृमा) = आपके लिए संस्कृत करते हैं। (जुषश्वम्) = आप उन वस्तुओं का प्रीतिपूर्वक सेवन कीजिए। वस्तुत: 'माता पिता की सेवा करना-उनको खिलाकर ही खाना' यह पितृयज्ञ है-एक गृहस्थ का यह प्रत्यक्ष धर्म है। ये पितर अपने क्रियात्मक उदाहरण से हमारे जीवनों में यज्ञों को प्रेरित करते हैं। २. हे पितरो। (ते) = वे आप लोग (शन्तमेन) = अत्यन्त शान्ति देनेवाले (अवसा) = रक्षण के साथ (आगत) = हमें प्राप्त होओ। (अधा) = और (ना:) = हमारे लिए (शंयो:) = शान्ति को तथा यावन [पृथक्-करण] को और (अरप:) = निदोषता को दधात-धारण कीजिए।
Essence
हमें पितरों का आदर करना चाहिए। ये यज्ञशील पितर हमारा रक्षण करते हुए हमें 'शान्ति, निर्भयता व निर्दोषता' प्राप्त कराते हैं।
Subject
शान्ति-निर्भयता-निर्दोषता