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Atharvaveda - Mantra 46

Atharvaveda 18/1/46

4 Sukta
61 Mantra
18/1/46
Devata- अनुष्टुप् Rishi- पितरगण Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
इ॒दं पि॒तृभ्यो॒नमो॑ अस्त्व॒द्य ये पूर्वा॑सो॒ ये अप॑रास ई॒युः। ये पार्थि॑वे॒ रज॒स्यानिष॑क्ता॒ ये वा॑ नू॒नं सु॑वृ॒जना॑सु दि॒क्षु ॥

इ॒दम् । पि॒तृऽभ्य॑: । नम॑: । अ॒स्तु॒ । अ॒द्य । ये । पूर्वा॑स: । ये । अप॑रास: । ई॒यु: । ये । पार्थि॑वे । रज॑सि । आ । निऽस॑क्ता: । ये । वा॒ । नू॒नम् । सु॒ऽवृ॒जना॑सु । दि॒क्षु ॥१.४६॥

Mantra without Swara
इदं पितृभ्योनमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो ये अपरास ईयुः। ये पार्थिवे रजस्यानिषक्ता ये वा नूनं सुवृजनासु दिक्षु ॥

इदम् । पितृऽभ्य: । नम: । अस्तु । अद्य । ये । पूर्वास: । ये । अपरास: । ईयु: । ये । पार्थिवे । रजसि । आ । निऽसक्ता: । ये । वा । नूनम् । सुऽवृजनासु । दिक्षु ॥१.४६॥

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Meaning
१. (इदम्) = यह (अद्य) = आज (पितृभ्य:) = उन सब पितरों के लिए (नमः अस्त) = नमस्कार हो। हम उन सब पितरों के लिए आदर का भाव धारण करते हैं, (ये) = जो (पूर्वास:) = हमारे जीवनों में सर्वप्रथम 'माता-पिता के रूप में (ईयु:) = आते हैं और (ये) = जो (अपरास) = अपर काल में [पीछे] आचार्यों व अतिथियों के रूप में आते हैं। २. उन पितरों के लिए हम आदर का भाव धारण करते हैं (ये) = जो (पार्थिवे रजसि) = इस पार्थिवलोक में-शरीर में (आ-निषत्ताः) = समन्तात् निषण्ण हैं, अर्थात् जिनका शरीर पर पूर्ण प्रभाव है, (वा) = तथा (ये) = जो (नूनम्) = निश्चय से (सुवजनासु) = [वृजन Strenght, power] उत्तम शक्तिवाली (दिक्षु) = दिशाओं में चल रहे हैं। अपने पर पूर्ण प्रभाव रखते हुए वे शक्तिशाली बने हैं।
Essence
हम 'माता-पिता व आचार्य, अतिथि' रूप पूर्व-अपर सब पितरों के लिए आदर का भाव धारण करते हैं। उन पितरों का लिए आदर का भाव धारण करते हैं जो शरीर पर पूर्ण प्रभुत्व रखते हुए शक्ति-सम्पादन की दिशाओं में चल रहे हैं।
Subject
पितरों का आदर