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Atharvaveda - Mantra 43

Atharvaveda 18/1/43

4 Sukta
61 Mantra
18/1/43
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- सरस्वती Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
सर॑स्वति॒ यास॒रथं॑ य॒याथो॒क्थैः स्व॒धाभि॑र्देवि पि॒तृभि॒र्मद॑न्ती। स॑हस्रा॒र्घमि॒डोअत्र॑ भा॒गं रा॒यस्पोषं॒ यज॑मानाय धेहि ॥

सर॑स्वति । या । स॒ऽरथ॑म् । य॒याथ॑ । उ॒क्थै: । स्व॒धाभि॑: । दे॒वि॒ । पि॒तृऽभि॑: । मद॑न्ती । स॒ह॒स्र॒ऽअ॒र्घम् । इ॒ड: । अत्र॑ । भा॒गम् । रा॒य: । पोष॑म् ।यज॑मानाय । धे॒हि॒ ॥१.४३॥

Mantra without Swara
सरस्वति यासरथं ययाथोक्थैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती। सहस्रार्घमिडोअत्र भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि ॥

सरस्वति । या । सऽरथम् । ययाथ । उक्थै: । स्वधाभि: । देवि । पितृऽभि: । मदन्ती । सहस्रऽअर्घम् । इड: । अत्र । भागम् । राय: । पोषम् ।यजमानाय । धेहि ॥१.४३॥

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Meaning
१. हे (सरस्वति) = ज्ञान की अधिष्ठात्री देवते! (यः) = जो तू (उक्थैः) = स्तोत्रों के साथ (सरथं ययाथ) = समान रथ में एक ही शरीररूप रथ में गतिवाली होती है। हे (देवि) = जीवन को प्रकाशमय बनानेवाली! तू (स्वधाभि:) = [स्व-धा] आत्मधारण-शक्तियों के साथ (पितृभिः) = तथा रक्षणात्मक कार्यों में व्याप्त लोगों के साथ (मदन्ती) = आनन्द का अनुभव करती है। ज्ञानी पुरुष अवश्य [क] प्रभु-स्तवन की वृत्तिवाला बनता है [उक्थैः] । [ख] यह आत्मशक्ति को धारण करता है [स्वधाभिः]।[ग] पालनात्मक कार्यों में व्याप्त होता है [पितृभिः]।२. हे सरस्वति । तू (अत्र) = इस हमारे जीवन में (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए [यज्ञ-पूजा, संगतिकरण, दान] तेरा पूजन करनेवाले, तेरा संग करनेवाले व तेरे प्रति अपने को दे डालनेवाले के लिए (सहस्त्रार्घम्) = अनन्त मूल्यवाले–अमूल्य इस (इड: भागम्) = ज्ञान की वाणी के भजनीयांश को तथा (रायस्पोषम्) = जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक धन का पोषण (धेहि) = धारण कर।
Essence
सरस्वती का आराधक [१] प्रभुभक्त बनता है, [२] आत्मशक्ति का धारण करता है, [३] रक्षणात्मक कार्यों में प्रवृत्त होता है [४] वेदवाणी का अमूल्य ज्ञानधन प्रास करता है और [५] आवश्यक धन का पोषक होता है।
Subject
सरस्वती का आराधक