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Atharvaveda - Mantra 41

Atharvaveda 18/1/41

4 Sukta
61 Mantra
18/1/41
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- सरस्वती Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
सर॑स्वतींदेव॒यन्तो॑ हवन्ते॒ सर॑स्वतीमध्व॒रे ता॒यमा॑ने। सर॑स्वतीं सु॒कृतो॑ हवन्ते॒सर॑स्वती दा॒शुषे॒ वार्यं॑ दात् ॥

सर॑स्वतीम् । दे॒व॒ऽयन्त॑: । ह॒व॒न्ते॒ । सर॑स्वतीम् । अ॒घ्व॒रे । ता॒यमा॑ने । सर॑स्वतीम् । सु॒ऽकृत॑: । ह॒व॒न्ते॒ । सर॑स्वती । दा॒शुषे॑ । वार्य॑म् । दा॒त् ॥१.४१॥

Mantra without Swara
सरस्वतींदेवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने। सरस्वतीं सुकृतो हवन्तेसरस्वती दाशुषे वार्यं दात् ॥

सरस्वतीम् । देवऽयन्त: । हवन्ते । सरस्वतीम् । अघ्वरे । तायमाने । सरस्वतीम् । सुऽकृत: । हवन्ते । सरस्वती । दाशुषे । वार्यम् । दात् ॥१.४१॥

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Meaning
१. (देवयन्तः) = दिव्यगुणों की प्रासि की कामनावाले और उनके द्वारा उस महान् देव प्रभु की प्राप्ति की कामनावाले पुरुष (सरस्वतीं हवन्ते) = विद्या की अधिष्ठात्री देवता को पुकारते हैं, अर्थात् ज्ञान-प्राप्ति के लिए यत्नशील होते हैं। यह ज्ञान ही उनके जीवन को पवित्र व दिव्यगुण सम्पन्न बनाकर उन्हें प्रभु-प्राप्ति के योग्य बनाएगा। २. (तायमाने अध्वरे) = विस्तृत किये जाते हुए यज्ञ के निमित्त (सरस्वतीम्) = सरस्वती को ही पुकारते हैं। वस्तुत: यह ज्ञान ही हमारे जीवनों को यज्ञमय बनाता है। सब (सुकृत:) = शुभ कर्मों को करनेवाले लोग इस (सरस्वतीं हवन्ते) = सरस्वती को पुकारते हैं। यह ज्ञान की आराधना ही तो उन्हें सब दुर्व्यसनों से बचाकर शुभ कर्मों में प्रवृत्त करती है। ३. वस्तुत: (सरस्वती) = यह ज्ञान की अधिष्ठात्री देवता (दाशुषे) = दाश्वान् के लिए आत्मार्पण करनेवाले व्यक्ति के लिए सब (वार्यम्) = वरणीय वस्तुओं को (दात्) = देती है। ज्ञान की आराधना हमारे जीवन में सब शुभों को प्राप्त कराती है।
Essence
सरस्वती का आराधन, अर्थात् ज्ञानप्राप्ति की लगन हमें दिव्यगुणसम्पन्न बनाकर प्रभु-प्राप्ति के योग्य बनाती है [देवयन्तः]। यह हमें यज्ञशील बनाती है [अध्वरे] पुण्य कर्मों में प्रवृत्त करती है [सुकृतः] और सब शुभों को प्राप्त कराती है [वार्य दात्]।
Subject
सरस्वती की आराधना