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Atharvaveda - Mantra 40

Atharvaveda 18/1/40

4 Sukta
61 Mantra
18/1/40
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- रुद्र Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
स्तु॒हि श्रु॒तंग॑र्त॒सदं॒ जना॑नां॒ राजा॑नं भी॒ममु॑पह॒त्नुमु॒ग्रम्। मृ॒डा ज॑रि॒त्रे रु॑द्र॒स्तवा॑नो अ॒न्यम॒स्मत्ते॒ नि व॑पन्तु॒ सेन्य॑म् ॥

स्तु॒हि । श्रु॒तम् । ग॒र्त॒ऽसद॑म् । जना॑नाम् । राजा॑नम् । भी॒मम् । उ॒प॒ऽह॒त्नुम् । उ॒ग्रम् । मृ॒ड । ज॒रि॒त्रे । रु॒द्र॒ । स्तवा॑न: । अ॒न्यम् । अ॒स्मत् । ते॒ । नि । व॒प॒न्तु॒ । सेन्य॑म् ॥१.४०॥

Mantra without Swara
स्तुहि श्रुतंगर्तसदं जनानां राजानं भीममुपहत्नुमुग्रम्। मृडा जरित्रे रुद्रस्तवानो अन्यमस्मत्ते नि वपन्तु सेन्यम् ॥

स्तुहि । श्रुतम् । गर्तऽसदम् । जनानाम् । राजानम् । भीमम् । उपऽहत्नुम् । उग्रम् । मृड । जरित्रे । रुद्र । स्तवान: । अन्यम् । अस्मत् । ते । नि । वपन्तु । सेन्यम् ॥१.४०॥

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Meaning
१. हे जीव! तू (स्तुहि) = उस प्रभु का स्तवन कर जोकि (श्रुतम्) = वेदवाणियों में सर्वत्र सुनने योग्य हैं[सर्वे वेदाः यत् पदमामनन्ति०] (गर्तसदम्) = जो हृदयरूप गुहा में आसीन है। (जनानां राजानम) = सब उत्पन्न होनेवाले लोगों के शासक हैं [इन्द्रो विश्वस्य राजति] (उपहलम्) = सब दुष्टों को विनष्ट करनेवाले हैं। (भीमम्) = शत्रुओं के लिए भयंकर हैं। (उनम्) = अत्यन्त तेजस्वी हैं। २. हे (रुद्र) = दुष्टों को रुलानेवाले प्रभो! (स्तवानः) = स्तुति किये जाते हुए आप (जरित्रे) = स्तोता के लिए (मृड) = सुख देनेवाले होइए। हे प्रभो! (ते) = आपकी (सेन्यम्) = सेनाएँ (अस्मत् अन्यम्) = हम स्तोताओं से भित्र पुरुषों को (निवपन्तु) = काटनेवाली हैं। सब आधिदैविक शक्तियाँ ही प्रभु की सेनाएँ हैं। नास्तिक व्यक्ति प्रभु की उपासना से दूर होकर इन शक्तियों की प्रतिकूलता के कारण रोग आदि का शिकार हो जाते हैं। उपासक के लिए ही 'धुलोक, अन्तरिक्षलोक व पृथिवीलोक' शान्ति देनेवाले होते हैं।
Essence
हम प्रभु का स्तवन करें। यह प्रभु-स्तवन हमें उचित प्रेरणा व शक्ति प्राप्त कराएगा। इससे हम स्वधर्म का पालन करते हुए प्रभु के सच्चे उपासक होंगे और सब कष्टों से बचे रहेंगे।
Subject
प्रभु-स्तवन व प्रभु का अनुग्रह