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Atharvaveda - Mantra 4

Atharvaveda 18/1/4

4 Sukta
61 Mantra
18/1/4
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
न य॑त्पु॒राच॑कृ॒मा कद्ध॑ नू॒नमृ॒तं वद॑न्तो॒ अनृ॑तं॒ रपे॑म। ग॑न्ध॒र्वो अ॒प्स्वप्या॑ च॒योषा॒ सा नौ॒ नाभिः॑ पर॒मं जा॒मि तन्नौ॑ ॥

न । यत् । पु॒रा । च॒कृ॒म । कत् । ह॒ । नू॒नम् । ऋ॒तम् । वद॑न्त: । अनृ॑तम् । र॒पे॒म॒ । ग॒न्ध॒र्व: । अ॒प्ऽसु । अप्या॑ । च॒ । योषा॑ । सा । नौ॒ । नाभि॑: । प॒र॒मम् । जा॒मि । तत् । नौ॒ ॥१.४॥

Mantra without Swara
न यत्पुराचकृमा कद्ध नूनमृतं वदन्तो अनृतं रपेम। गन्धर्वो अप्स्वप्या चयोषा सा नौ नाभिः परमं जामि तन्नौ ॥

न । यत् । पुरा । चकृम । कत् । ह । नूनम् । ऋतम् । वदन्त: । अनृतम् । रपेम । गन्धर्व: । अप्ऽसु । अप्या । च । योषा । सा । नौ । नाभि: । परमम् । जामि । तत् । नौ ॥१.४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. यम उत्तर देता हुआ कहता है कि (यत्) = जिस बात को (पुरा) = इससे पहली सृष्टि में (कत् हन चकृमा) = कभी भी नहीं किया है, (नूनम्) = निश्चय से (ऋतं वदन्त:) = सत्यों को ही अपने जीवन से कहते हुए हम (अनृतं रपेम) = अनृत को परे भगा दें। जो सत्य नहीं है, उसे अपने जीवन में क्यों लाएँ। यह ठीक नहीं है। २. सृष्टि के प्रारम्भ में पुरुष (गन्धर्व) = वेदवाणी का धारण करनेवाला है तथा (अप्सु) = कर्मों में निवासवाला है (च) = और (योषा) = स्त्री भी (अप्या) = कर्मों में उत्तमता से लगी रहनेवाली है। वस्तुत: इसीलिए तो वह (योषा) = गुणों को अपने से संपृच्य करनेवाली तथा दोषों को अपने से दूर करनेवाली है। (स:) = वह ज्ञान का धारण व कर्मशीलता ही हम सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होनेवाले स्त्री-पुरुषों का (नाभि:) = बन्धन है-हमें परस्पर बाँधनेवाली बात है। (तत) = वही (नौ) = हम दोनों का भी (परमं जामि) = सर्वोत्कृष्ट बन्धुत्व है 'पति पत्नी' बनने से ही तो बन्धुत्व नहीं होता?
Essence
पिछली सृष्टि में भी भाई-बहिन कभी पति-पत्नी के समीप सम्बन्ध में सम्बद्ध नहीं हुए। सदा ऋत का आचरण करते हुए हमें अनृत को अपनाना शोभा नहीं देता। 'ज्ञानधारण व क्रियामय जीवन' ही पुरुष-स्त्री का सर्वोत्कृष्ट सम्बन्ध है। वही भाई-बहिन का परम बन्धुत्व है।
Subject
उत्कृष्ट बन्धुत्व