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Atharvaveda - Mantra 39

Atharvaveda 18/1/39

4 Sukta
61 Mantra
18/1/39
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
स्ते॒गो नक्षामत्ये॑षि पृथि॒वीं म॒ही नो॒ वाता॑ इ॒ह वा॑न्तु॒ भूमौ॑। मि॒त्रो नो॒ अत्र॒वरु॑णो यु॒ज्यमा॑नो अ॒ग्निर्वने॒ न व्य॑सृष्ट॒ शोक॑म् ॥

स्ते॒ग: । न । क्षाम् । अति॑ । ए॒षि॒ । पृ॒थि॒वीम् । म॒ही इति॑ । न॒:। वाता॑: । इ॒ह । वा॒न्तु॒ । भूमौ॑ । मि॒त्र: । न॒: । अत्र॑ । वरु॑ण: । यु॒ज्यमा॑न: । अ॒ग्नि: । वने॑ । न । वि । अ॒सृ॒ष्ट॒ । शोक॑म् ॥१.३९॥

Mantra without Swara
स्तेगो नक्षामत्येषि पृथिवीं मही नो वाता इह वान्तु भूमौ। मित्रो नो अत्रवरुणो युज्यमानो अग्निर्वने न व्यसृष्ट शोकम् ॥

स्तेग: । न । क्षाम् । अति । एषि । पृथिवीम् । मही इति । न:। वाता: । इह । वान्तु । भूमौ । मित्र: । न: । अत्र । वरुण: । युज्यमान: । अग्नि: । वने । न । वि । असृष्ट । शोकम् ॥१.३९॥

Meaning
१. (स्तेग:) = [स्त्यायते Spread about] हे प्रभो! चारों ओर व्याप्त होते हुए आप इस (क्षाम्) [क्षि-निवासे] = हमारी निवासस्थानभूत (पृथिवीम्) = शरीररूप पृथिवी को (न अति एषि) = कभी लाँधकर नहीं जाते हो। आपका सर्वश्रेष्ठ निवासस्थान [परम व्योम] हमारा हृदय ही होता है। हम सदा हृदय में आपका स्मरण करें। ऐसा करने पर (इह भूमौ) = यहाँ पृथिवी पर (न:) = हमारे लिए (मही वात:) = महत्त्वपूर्ण-हमें शक्ति देनेवाली वायुएँ (वान्तु) = बहें। हमारे लिए सारा वातावरण बड़ा अनुकूल हो। २. (मित्र:) = वह सबके प्रति स्नेह करनेवाला, (वरुण:) = द्वेष का निवारण करनेवाला प्रभु (युज्यमान:) = योग द्वारा सम्पृक्त होता हुआ (अत्र) = यहाँ-इस जीवन में (न:) = हमारे लिए (शोकम्) = दीप्ति को (व्यसृष्ट) = विशेषरूप से उत्पन्न करता है, उसीप्रकार (न) = जैसेकि [न-इव] (अग्निः) = बने-अग्नि वन में वनाग्नि को उत्पन्न करके विशिष्ट दीति उत्पन्न करता है।
Essence
सर्वव्यापक होते हुए भी प्रभु हमारे हृदयों में विशेषरूप से उपासनीय होते हैं। उस समय हमारा सारा वातावरण बड़ा सुन्दर बनता है। प्रभु का उपासक जब स्नेह व निद्वेषतावाला बनता है तब उसका हृदय प्रभु-दीप्ति से दीप्त हो उठता है।
Subject
हृदय में प्रभु का उपासन व दीप्त जीवन

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