Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 38

Atharvaveda 18/1/38

4 Sukta
61 Mantra
18/1/38
Devata- परोष्णिक् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
शव॑सा॒ ह्यसि॑श्रु॒तो वृ॑त्र॒हत्ये॑न वृत्र॒हा। म॒घैर्म॒घोनो॒ अति॑ शूर दाशसि ॥

शव॑सा । हि । असि॑ । श्रु॒त: । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑न । वृ॒त्र॒ऽहा । म॒घै: । म॒घोन॑: । अति॑ । शू॒र॒ । दा॒श॒सि॒ ॥१.३८।

Mantra without Swara
शवसा ह्यसिश्रुतो वृत्रहत्येन वृत्रहा। मघैर्मघोनो अति शूर दाशसि ॥

शवसा । हि । असि । श्रुत: । वृत्रऽहत्येन । वृत्रऽहा । मघै: । मघोन: । अति । शूर । दाशसि ॥१.३८।

Meaning
१. हे (शूर) = शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले प्रभो! आप (हि) = निश्चय से (शवसा) = बल से (श्रुतः असि) = प्रसिद्ध हैं। सर्वशक्तिमान् हैं। (वृत्रहत्येन) = हमारे सबसे महान् शत्रु वृत्र का ज्ञान की आवरणभूत कामवासना का विनाश करने से आप वृत्र-हा-वृत्र का हनन करनेवाले कहलाये हैं। २. हे शूर! आप (मघैः) = अपने ऐश्वयों के द्वारा (मघोनः अति) = सब ऐश्वर्य-सम्पन्नों को लाँधकर (दाशसि) = देनेवाले हैं। आप के समान अन्य कोई दाता नहीं है।
Essence
सर्वशक्तिमान् प्रभु हमारे प्रबलतम वासनारूप शत्रुओं का विनाश करते हैं। वे परमैश्वर्यशाली प्रभु ही सर्वमहान् दाता हैं।
Subject
शवसा मघैः

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.