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Atharvaveda - Mantra 35

Atharvaveda 18/1/35

4 Sukta
61 Mantra
18/1/35
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
यस्मि॑न्दे॒वावि॒दथे॑ मा॒दय॑न्ते वि॒वस्व॑तः॒ सद॑ने धा॒रय॑न्ते। सूर्ये॒ज्योति॒रद॑धुर्मा॒स्यक्तून्परि॑ द्योत॒निं च॑रतो॒ अज॑स्रा ॥

यस्मि॑न् । दे॒वा: । वि॒दथे॑ । मा॒दय॑न्ते । वि॒वस्व॑त: । सद॑ने । धा॒रय॑न्ते । सूर्ये॑ । ज्योति॑: । अद॑धु: । मा॒सि । अ॒क्तून् । प॑रि । द्यो॒त॒निम् । च॒र॒त॒: । अज॑स्रा ॥१.३५॥

Mantra without Swara
यस्मिन्देवाविदथे मादयन्ते विवस्वतः सदने धारयन्ते। सूर्येज्योतिरदधुर्मास्यक्तून्परि द्योतनिं चरतो अजस्रा ॥

यस्मिन् । देवा: । विदथे । मादयन्ते । विवस्वत: । सदने । धारयन्ते । सूर्ये । ज्योति: । अदधु: । मासि । अक्तून् । परि । द्योतनिम् । चरत: । अजस्रा ॥१.३५॥

Meaning
१. प्रभु की रक्षा प्राप्त करनेवाले देवा: देववृत्ति के लोग यस्मिन्-जिस समय, प्रभु की गोद में रहते हुए (विदथे मादयन्ते) = ज्ञानयज्ञों में हर्ष का अनुभव करते हैं, अर्थात् सदा ज्ञानप्रधान जीवन बिताते हैं तब (विवस्वतः) = सूर्य के (सदने) = निवासस्थान द्युलोक में (धारयन्ते) = अपना धारण करते हैं। ये मस्तिष्क प्रधान [Sensible] बनते हैं-शरीर में मस्तिष्क ही तो झुलोक है। २. सूर्य-[सूर्यश्चक्षुर्भूत्वा०] अपनी आँखों में (ज्योति: अदधुः) = प्रकाश को धारण करते हैं-इनकी आँखों में सदा चमक होती है। मासि [चन्द्रमा मनो भूत्वा, मास् moon]-अपने मनों में (अक्तून्) = प्रकाश की किरणों को धारण करते हैं, अर्थात् हृदयस्थ प्रभु के प्रकाश को देखते हैं। इसप्रकार की वृत्तिवाले पति-पत्नी अजस्त्रा [अ-जस्]-सदा कर्मों को करनेवाले (द्योतनिम्) = ज्ञान की ज्योति का (परिचरत:) = सदा उपासन करते हैं। इसप्रकार आदर्श गृहस्थ 'निरन्तर क्रियाशील व ज्ञान के उपासक' होते हैं।
Essence
हम ज्ञानयज्ञों में आनन्द लें, सदा समझदारी से चलें। हमारी आँखों में ज्योति हो और मन में आहाद। हम क्रियाशील हों और ज्ञान के उपासक बनें।
Subject
क्रियाशीलता व ज्ञान की उपासना

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