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Atharvaveda - Mantra 34

Atharvaveda 18/1/34

4 Sukta
61 Mantra
18/1/34
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
दु॒र्मन्त्वत्रा॒मृत॑स्य॒ नाम॒ सल॑क्ष्मा॒ यद्विषु॑रूपा॒ भवा॑ति। य॒मस्य॒ योम॒नव॑ते सु॒मन्त्व॑ग्ने॒ तमृ॑ष्व पा॒ह्यप्र॑युच्छन् ॥

दु॒:ऽमन्तु॑ । अत्र॑ । अ॒मृत॑स्य । नाम॑ । सऽल॑क्ष्मा । यत् । विषु॑ऽरूपा । भवा॑ति । य॒मस्य॑ । य: । म॒नव॑ते । सु॒ऽमन्तु॑ । अग्ने॑ । तम् । ऋ॒ष्व॒ । पा॒हि॒ । अप्र॑ऽयुच्छन् ॥१.३४॥

Mantra without Swara
दुर्मन्त्वत्रामृतस्य नाम सलक्ष्मा यद्विषुरूपा भवाति। यमस्य योमनवते सुमन्त्वग्ने तमृष्व पाह्यप्रयुच्छन् ॥

दु:ऽमन्तु । अत्र । अमृतस्य । नाम । सऽलक्ष्मा । यत् । विषुऽरूपा । भवाति । यमस्य । य: । मनवते । सुऽमन्तु । अग्ने । तम् । ऋष्व । पाहि । अप्रऽयुच्छन् ॥१.३४॥

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1 Bhashyas
Meaning
१. प्रभु को भूल गये तो प्रभु को क्या प्राप्त करेंगे, अत: प्रभु-स्मरण आवश्यक है। यह बात भी ठीक है कि (अत्र) = यहाँ-इस संसार में (अमृतस्य नाम) = अविनाशी प्रभु का नाम (दुर्मन्तु) = स्मरण करना कठिन है, (यत्) = क्योंकि (सलक्ष्मा) = यह उत्तम लक्षणोंवाली [लक्ष्मभिः सहिता] प्रकृति (विषुरूपा भवाति) = विविध सुन्दर रूपोंवाली होती है। यह हिरण्मयी प्रकृति हमारे ध्यान को आकृष्ट करके हमें प्रभु से दूर ले-जाती है। २. (य:) = जो मनुष्य (यमस्य) = उस नियन्ता प्रभु के (सुमन्तु) = उत्तम मननयोग्य नाम का (मनवते) = मनन करता है, (अग्ने) = हे अग्रणी! (ऋष्व) = दर्शनीय व जानने योग्य प्रभो! (तम्) = उस नामस्मरण करनेवाले को (अप्रयुच्छन्) = प्रमादरहित होते हुए आप (पाहि) = रक्षित करते हो। यह स्तोता अवश्य आपकी रक्षा का पात्र होता है।
Essence
प्रकृति की चमक के कारण यहाँ-इस संसार में मनुष्य प्रभु को भूल जाता है, प्रभु-नामस्मरण से दूर हो जाता है, परन्तु जब भी हम उस प्रभु के नाम का स्मरण कर पाते हैं तब प्रभु के द्वारा रक्षणीय होते हैं।
Subject
नाम-स्मरण की दुष्करता