Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Atharvaveda - Mantra 3

Atharvaveda 18/1/3

4 Sukta
61 Mantra
18/1/3
Devata- त्रिष्टुप् Rishi- यम, मन्त्रोक्त Chhanda- अथर्वा Suktam- पितृमेध सूक्त
Mantra with Swara
उ॒शन्ति॑ घा॒ तेअ॒मृता॑स ए॒तदेक॑स्य चित्त्य॒जसं॒ मर्त्य॑स्य। नि ते॒ मनो॒ मन॑सि धाय्य॒स्मेजन्युः॒ पति॑स्त॒न्वमा वि॑विष्याः ॥

उ॒शन्ति॑ । घ॒ । ते । अ॒मृता॑स: । ए॒तत् । एक॑स्य । चि॒त् । त्य॒जस॑म् । मर्त्य॑स्य । नि । ते॒ । मन॑: । मन॑सि । धा॒यि॒ । अ॒स्मे इति॑ । जन्यु॑: । पति॑: । त॒न्व᳡म् । आ । वि॒वि॒श्या॒: ॥१.३॥

Mantra without Swara
उशन्ति घा तेअमृतास एतदेकस्य चित्त्यजसं मर्त्यस्य। नि ते मनो मनसि धाय्यस्मेजन्युः पतिस्तन्वमा विविष्याः ॥

उशन्ति । घ । ते । अमृतास: । एतत् । एकस्य । चित् । त्यजसम् । मर्त्यस्य । नि । ते । मन: । मनसि । धायि । अस्मे इति । जन्यु: । पति: । तन्वम् । आ । विविश्या: ॥१.३॥

Meaning
१. यमी कहती है कि (ते) = वे (अमृतासः) = भोगों के पीछे न मरनेवाले [अमृत] पुरुष भी (एतत्) = इस पति-पत्नी सम्बन्ध को (घा उशन्ति) = चाहते ही हैं। प्रभु के अमृत मानसपुत्र इस सम्बन्ध द्वारा ही तो लोक में इन प्रजाओं को जन्म देते हैं। वे तो इस सम्बन्ध को (चित्) = निश्चय से (एकस्य मर्त्यस्यः) = एक मनुष्य का (त्यजसम्) = त्याग समझते हैं। सन्तानोत्पत्ति के लिए यह वीर्य का दान तो सचमुच एक महान् त्याग है। २. इसलिए हे यम! (ते मन:) = तेरा मन (अस्मे मनसि धायि) = हमारे मन में निहित हो, अर्थात् तु मेरी कामना करनेवाला हो। जन्युः पतिः सन्तान को जन्म देनेवाला पति बनकर (तन्वं आविविश्या:) = मेरे शरीर में प्रवेश कर। ('तद्धि जायाया जायात्वं यदस्यां जायते पुनः') = यही तो जाया का जायात्व है कि पुरुष पुनः उसमें जन्म लेता है। एवं पुत्र के रूप में उत्पन्न होकर वह पुरुष अमर बना रहता है 'प्रजाभिरग्ने अमृतत्वमश्याम् ।
Essence
प्रभु के मानसपुत्र भी परस्पर पति-पत्नी भाव को चाहते ही हैं। यह तो एक महान त्याग है। सन्तान को जन्म देने के लिए यह सम्बन्ध अनिन्द्य है।
Subject
सन्तान के लिए वीर्यदान की अनिन्द्यता

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.